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खामेनेई के बाद ईरान का क्या होगा? — तीन रास्ते, तीन खतरे, और एक बड़ा सवाल जो पूरी दुनिया पूछ रही है
कुछ ईरानी सड़कों पर जश्न मना रहे हैं, कुछ डरे हुए हैं — विशेषज्ञ बोले, “बल्ब बदलना है तो टूटा हुआ निकालना काफी नहीं, नया लगाना भी पड़ेगा।”
जब कोई पेड़ 35 साल तक खड़ा रहे और एक दिन अचानक गिर जाए — तो उसकी जगह खाली ज़मीन रह जाती है। वहां क्या उगेगा, यह कोई नहीं जानता।
ईरान के साथ अभी यही हो रहा है।
अयातुल्लाह अली खामेनेई — जिन्होंने 1989 से ईरान पर राज किया। जिन्होंने परमाणु कार्यक्रम चलाया, पश्चिम से लड़ाई की, प्रदर्शनकारियों को कुचला और पूरे मध्य-पूर्व में ईरान का प्रभाव फैलाया — वो अब नहीं रहे।
इज़राइल और अमेरिका के संयुक्त हमले में उनकी मौत की पुष्टि खुद ईरानी सरकारी मीडिया ने कर दी। फार्स न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक वो हमले के वक्त अपने आवास के दफ्तर में ही थे।
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कुछ जश्न मना रहे हैं, कुछ डरे हुए हैं
अमेरिका में बसे ईरानी इंजीनियर मसूद गोदरत अबादी ने CNBC से कहा — “खामेनेई मर गए। यह मेरी ज़िंदगी का सबसे अच्छा दिन है। ईरान के लिए यह एक गौरवशाली दिन है।”
सोशल मीडिया पर कुछ ईरानी सड़कों पर जश्न मनाते दिखे। न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी इसकी रिपोर्ट की।
लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं — खुशी मनाना और बदलाव आना दो अलग-अलग बातें हैं।
खामेनेई कैसे बने थे सुप्रीम लीडर?
यह जानना ज़रूरी है। 1989 में जब इस्लामी क्रांति के संस्थापक अयातुल्लाह खुमैनी की मौत हुई — तब खामेनेई उनके स्पष्ट उत्तराधिकारी नहीं थे। उनके पास उस वक्त संविधान के मुताबिक ज़रूरी धार्मिक योग्यता भी नहीं थी।
लेकिन खुमैनी की मौत से कुछ महीने पहले ही संविधान बदल दिया गया — और शर्तें नरम कर दी गईं। इसी बदलाव ने खामेनेई के लिए रास्ता खोला।
यह कुछ वैसा ही है जैसे किसी कंपनी में CEO बनने के लिए MBA ज़रूरी हो — और जब पसंदीदा उम्मीदवार के पास MBA न हो तो नियम ही बदल दिया जाए।
अब आगे क्या — तीन रास्ते
काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस यानी CFR ने तीन संभावित रास्ते बताए हैं —
पहला — सत्ता की निरंतरता यानी “खामेनेई-इज़्म विदाउट खामेनेई।” एक नया सुप्रीम लीडर आए जो उन्हीं की नीतियां चलाए। लेकिन नया नेता “काम सीखते-सीखते” देश चलाएगा — और इस दौरान अर्थव्यवस्था और ज़्यादा डूब सकती है।

दूसरा — सैन्य तानाशाही — IRGC यानी रिवोल्यूशनरी गार्ड सत्ता पर काबिज़ हो जाए। CFR का कहना है कि यह भी कोई राहत नहीं होगी — सेना स्थिरता का दावा करेगी लेकिन ईरान की “बुरी तरह बर्बाद अर्थव्यवस्था” और ढहती मुद्रा को नहीं संभाल पाएगी।
तीसरा — शासन का पतन — यानी पूरी व्यवस्था चरमरा जाए। लेकिन CFR का मानना है कि इनमें से कोई भी रास्ता अगले एक-दो साल में कोई बड़ा सकारात्मक बदलाव नहीं लाएगा।
“बल्ब बदलना है तो नया लगाना भी पड़ेगा”
Sea-Change Partners के मैनेजिंग डायरेक्टर कीथ फिट्ज़गेराल्ड ने सबसे सटीक बात कही — “खामेनेई को मारना अपने आप में ‘शासन परिवर्तन’ नहीं है। यह ऐसा है जैसे बल्ब बदलना हो — पहले टूटा हुआ निकालना पड़ता है। लेकिन सिर्फ निकालना बल्ब बदलना नहीं है। नया लगाना भी पड़ेगा।”
और ईरान में “नया बल्ब” कौन होगा — यही सबसे बड़ा सवाल है।
विदेश में बैठा विपक्ष — बिखरा हुआ, कमज़ोर
ईरान का विपक्ष बाहर से देखने पर बड़ा लगता है — लेकिन हकीकत में यह बुरी तरह बिखरा हुआ है। इसमें शामिल हैं — 1979 की क्रांति में देश छोड़ने वाले शाह के बेटे रज़ा पहलवी के समर्थक राजतंत्रवादी, यूरोप और अमेरिका में बिखरे हुए गणतांत्रिक कार्यकर्ता, पश्चिमी सीमाओं पर सक्रिय कुर्द विपक्षी दल और MEK जिसकी विदेश में तो संगठित नेटवर्क है लेकिन ईरान के अंदर कोई विश्वसनीयता नहीं।
NATO के पूर्व विश्लेषक ने कहा — “बाहर से कोई नेता थोपना खतरनाक है। ऐसे प्रयोग इतिहास में बुरी तरह फेल हो चुके हैं।”
अर्थव्यवस्था — सबसे बड़ा संकट
Clocktower Group के चीफ स्ट्रैटेजिस्ट मार्को पापिच ने साफ कहा — “ईरान की अर्थव्यवस्था जल्द ही पार्किंग लॉट बन जाएगी — जब तक नया सुप्रीम लीडर अमेरिका से बातचीत के लिए तैयार न हो।”
और अगर नया नेता भी कट्टरपंथी हुआ तो अमेरिकी हमले और भी ज़्यादा विनाशकारी होंगे।
ईरान अभी एक चौराहे पर खड़ा है — जहां से हर रास्ता मुश्किल है।
