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हँसी का बादशाह चला गया: बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता असरानी का 84 साल की उम्र में निधन
चार दशक, चार सौ से ज़्यादा फ़िल्में और हज़ारों मुस्कानें — असरानी ने हंसी को अभिनय की ऊंचाई पर पहुंचाया, अब वही हंसी सदा के लिए खामोश हो गई।
मुंबई — “हम अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर हैं!” — ये संवाद सुनते ही आज भी सिनेमाघरों में ठहाके गूंज उठते हैं। और अब वही शख्स, जिसने हिंदी सिनेमा को हंसी का सबसे मानवीय चेहरा दिया, पर्दे से हमेशा के लिए चला गया। मशहूर अभिनेता और कॉमेडियन गोवर्धन असरानी का 84 वर्ष की आयु में मुंबई में निधन हो गया।
असरानी सिर्फ एक कॉमेडियन नहीं थे, बल्कि एक भावनात्मक कलाकार थे जिन्होंने यह साबित किया कि हास्य सिर्फ मज़ाक नहीं, बल्कि समाज का आईना भी हो सकता है।
“जेलर” से लेकर “ड्रीम गर्ल 2” तक — हर दौर में असरानी ज़िंदा रहे
राजेश खन्ना के सॉफ्ट रोमांस के दौर में हों या अमिताभ बच्चन के “एंग्री यंग मैन” के ज़माने में, असरानी हमेशा हर युग का अहम हिस्सा बने रहे।
उनका किरदार चाहे शोले का जेलर रहा हो, नमक हराम का धोंडूदास, या बावर्ची का म्यूज़िक-लवर बब्बू — हर जगह उन्होंने अपने अभिनय से दर्शकों को जोड़ा।
उनकी चेहरे की लचक और आवाज़ की लय ने संवादों को जीवन दे दिया।
यह वही अभिनेता थे जिन्होंने गुड्डी में भावनाओं को, अभिमान में संवेदनाओं को और मेरे अपने में समाज की विडंबना को उजागर किया।
“कॉमिक टाइमिंग” में उनका कोई सानी नहीं था
असरानी ने जब फ़िल्म इंडस्ट्री में कदम रखा, तब मेहमूद जैसे दिग्गज कॉमेडियन हावी थे। लेकिन असरानी ने अपनी एक अलग जगह बनाई। उन्होंने जॉनी वॉकर और गोपे की परंपरा को आगे बढ़ाया, लेकिन उसमें “मिड-क्लास इंडिया” की सच्चाई जोड़ दी — वही आम आदमी की झिझक, वही संघर्ष और वही व्यंग्य।
फ़िल्म शोले में उनका हिटलर-स्टाइल जेलर आज भी मीम संस्कृति का हिस्सा है।
वो सीन, जहाँ वो कहता है “हम अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर हैं!” — आज भी भारत में हर पीढ़ी को याद है।
उनका यह किरदार इतना गहराई से लोगों के दिल में बसा कि हास्य की परिभाषा ही बदल गई।
सीखने और सिखाने दोनों के प्रतीक
राजस्थान के जयपुर में एक सिंधी परिवार में जन्मे असरानी अपने पिता के कालीन व्यापार से अलग होकर अपने सपनों का पीछा करने मुंबई आए।
फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) से उन्होंने अभिनय की बारीकियाँ सीखीं, और बाद में वहीं लौटकर संस्थान के प्रिंसिपल बने।
उन्होंने सैकड़ों उभरते कलाकारों को सिखाया कि “हंसाना भी एक गंभीर कला है।”
उनकी यह यात्रा बताती है कि असरानी सिर्फ अभिनय नहीं करते थे — वो अभिनय जीते थे।

निर्देशन की दिशा में भी कदम
कम ही लोग जानते हैं कि असरानी ने सिर्फ अभिनय नहीं, बल्कि निर्देशन में भी हाथ आजमाया।
उनकी फ़िल्म चला मुरारी हीरो बनने में उन्होंने खुद को एक संघर्षरत अभिनेता के रूप में दिखाया — जो असल में उनके अपने जीवन का आईना था।
यह फ़िल्म अपने समय से आगे थी — यह बताती थी कि सपनों की कीमत मेहनत और असफलताओं से चुकानी पड़ती है।
बाद में उन्होंने हम नहीं सुधरेंगे, दिल ही तो है और उड़ान जैसी फ़िल्में निर्देशित कीं, जहाँ उन्होंने रोमांस और सामाजिक विषयों को जोड़ा।
अभिनय की उम्र नहीं होती
असरानी ने कभी खुद को सीमित नहीं किया।
जहाँ 1980 के दशक में उन्होंने जीतेन्द्र की कॉमेडी फ़िल्मों में चमक बिखेरी, वहीं 2000 के दशक में अमिताभ बच्चन के साथ बागबान में भावनात्मक भूमिका निभाई।
इसके बाद उन्होंने डेविड धवन और प्रियदर्शन के दौर में हुलचुल और मालामाल वीकली जैसी फ़िल्मों से नई पीढ़ी को भी हंसी का तोहफा दिया।
यहाँ तक कि ड्रीम गर्ल 2 और द ट्रायल जैसी नई पीढ़ी की परियोजनाओं में भी उनकी मौजूदगी महसूस की गई।
“कॉमेडी बूढ़ी नहीं होती, बस स्टाइल बदलता है” — असरानी इसका सबसे जीवंत उदाहरण थे।
श्रद्धांजलि
असरानी का जाना सिर्फ एक अभिनेता की मौत नहीं — बल्कि हिंदी सिनेमा के उस दौर की विदाई है, जब हंसी में दिल की गहराई छिपी होती थी।
वो हमें यह सिखा गए कि हर आंसू के पीछे एक मुस्कान छिपी होती है, बस उसे महसूस करने के लिए असरानी जैसा दिल चाहिए।
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