Politics
Great Nicobar project पर फिर उठा विवाद, Jairam Ramesh बोले- आदिवासी अधिकारों की अनदेखी हो रही
कांग्रेस नेता ने केंद्र सरकार पर Forest Rights Act के उल्लंघन का आरोप लगाया, कहा- शोंपेन और निकोबारी समुदाय की सहमति के बिना आगे बढ़ रहा प्रोजेक्ट
नई दिल्ली: ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट को लेकर राजनीतिक और कानूनी विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने केंद्र सरकार पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि यह महत्वाकांक्षी परियोजना Forest Rights Act (FRA), 2006 की भावना और कानून दोनों के खिलाफ आगे बढ़ाई जा रही है।
जयराम रमेश ने केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुअल ओराम को पत्र लिखकर आरोप लगाया कि इस परियोजना के लिए आदिवासी समुदायों की “सूचित सहमति” लेने की प्रक्रिया पूरी नहीं की गई। उन्होंने कहा कि सरकार लगातार यह दावा कर रही है कि शोंपेन और निकोबारी समुदाय को कोई नुकसान नहीं होगा, लेकिन जमीन पर स्थिति अलग दिखाई देती है।
रमेश के मुताबिक, परियोजना के पहले चरण में करीब 130 वर्ग किलोमीटर से अधिक वन क्षेत्र को दूसरी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जाना है। उन्होंने कहा कि यही जंगल और इलाके स्थानीय जनजातियों की पारंपरिक भूमि और जीवन का हिस्सा हैं।
उन्होंने यह भी दावा किया कि प्रोजेक्ट से जुड़े नक्शों में खुद “शोंपेन जनजाति के स्थान” को प्रोजेक्ट सीमा के भीतर दिखाया गया है। इसके बावजूद प्रशासन यह कह रहा है कि किसी आदिवासी क्षेत्र को प्रभावित नहीं किया जा रहा।
कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने वास्तविक आदिवासी समुदायों के बजाय कुछ गैर-आदिवासी बस्तियों से सहमति लेकर प्रक्रिया पूरी दिखाने की कोशिश की। उन्होंने इसे कानून की भावना के खिलाफ बताया।
जयराम रमेश ने अपने पत्र में यह भी कहा कि जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने स्वतंत्र जांच या मूल्यांकन करने के बजाय अंडमान-निकोबार प्रशासन के दावों पर ही भरोसा कर लिया। उन्होंने मंत्रालय द्वारा अदालत में खुद को मामले से अलग रखने की कोशिश पर भी सवाल उठाए।
दरअसल, ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को केंद्र सरकार एक बड़े रणनीतिक और आर्थिक कदम के रूप में पेश कर रही है। सरकार का कहना है कि इस प्रोजेक्ट से भारत को समुद्री व्यापार और राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में बड़ा फायदा मिलेगा।
सरकार के अनुसार, ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति अंतरराष्ट्रीय शिपिंग रूट के बेहद करीब है, जिससे भारत विदेशी ट्रांसशिपमेंट पोर्ट्स पर अपनी निर्भरता कम कर सकेगा। इसके अलावा यहां रक्षा और लॉजिस्टिक्स से जुड़े बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने की योजना है।
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केंद्र का यह भी कहना है कि परियोजना के लिए केवल सीमित वन क्षेत्र का उपयोग होगा और इसके बदले बड़े पैमाने पर compensatory afforestation यानी नए जंगल विकसित किए जाएंगे। सरकार ने साफ किया है कि शोंपेन और निकोबारी समुदाय के विस्थापन का कोई प्रस्ताव नहीं है।

हालांकि विपक्ष और पर्यावरण से जुड़े कई विशेषज्ञ मानते हैं कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी है। उनका कहना है कि देश की रणनीतिक जरूरतें महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आदिवासी समुदायों के अधिकारों और उनकी संस्कृति को भी उतनी ही गंभीरता से बचाया जाना चाहिए।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट अब सिर्फ एक इंफ्रास्ट्रक्चर योजना नहीं रह गया है, बल्कि यह विकास, पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों के बीच संतुलन की बड़ी बहस बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक और कानूनी लड़ाई और तेज हो सकती है।

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