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धुरंधर 2 कभी लियारी गैंगवॉर की कहानी थी ही नहीं असली निशाना था कहीं और
रणवीर सिंह की यह फ़िल्म गलियों की लड़ाई से शुरू होकर पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क की जड़ें उखाड़ने की कहानी बन जाती है — और यही इसकी असली ताकत है।
जब धुरंधर का पहला पार्ट आया था, तो बहुत से दर्शक सिनेमाहॉल से निकले थे तो माथे पर बल लिए हुए। उन्हें उम्मीद थी एक क्रॉसबॉर्डर जासूसी थ्रिलर की, लेकिन मिली एक पुरानी ढर्रे वाली गैंगस्टर कहानी — एक अजनबी किसी नई बस्ती में आता है, किसी गैंग से जुड़ता है, भरोसा कमाता है, और ऊपर चढ़ता जाता है। लेकिन जब धुरंधर 2 आया — 19 मार्च से सिनेमाघरों में तूफान मचाए हुए है — तब जाकर तस्वीर पूरी हुई।
लियारी सिर्फ बैकग्राउंड था, असली खेल कुछ और था
कराची की लियारी बस्ती — घनी आबादी, तंग गलियां, और दशकों से चले आ रहे गैंगवॉर का इतिहास। धुरंधर फ्रैंचाइज़ ने इस बस्ती को दुनिया के नक्शे पर उस तरह उकेरा, जैसे कोई फ़िल्म ही कर सकती है। लेकिन लियारी इस कहानी की मंज़िल नहीं थी — यह तो बस एक दरवाज़ा था।
जसकीरत सिंह रंगी उर्फ हमज़ा अली मज़ारी (रणवीर सिंह) लियारी की गलियों में इसलिए नहीं उतरा था कि वहां राज करे। वह उतरा था इसलिए कि पाकिस्तान में पल रहे आतंकवाद की जड़ तक पहुंचे और उसे खत्म करे। डायरेक्टर आदित्य धर का यही ‘बड़ा खेल’ था, जो पार्ट वन में बीज की तरह बोया गया और पार्ट 2 में पेड़ बनकर खड़ा हो गया।

विश्वास जीता, फिर वार किया
हमज़ा की कहानी किसी शतरंज के उस्ताद जैसी है जो हर चाल दस कदम आगे सोचकर चलता है। रहमान ‘डकैत’ बलोच (अक्षय खन्ना) की गैंग में घुसना आसान नहीं था — एक खूनी मुठभेड़ में उसने रहमान के बड़े बेटे नईम को नहीं बचा पाया, लेकिन छोटे बेटे फैज़ल को सुरक्षित निकाल लाया। बस इसी एक पल ने उसे गैंग का हिस्सा बना दिया।
यहां से शुरू हुआ हमज़ा का असली खेल। उसने न सिर्फ रहमान डकैत का भरोसा जीता, बल्कि उसके भतीजे उज़ैर बलोच (डेनिश पांडोर) के मन में भी अपनी जगह बनाई — वो भाई जो दूसरी माँ का हो, लेकिन जान से ज़्यादा प्यारा। उज़ैर ने हमज़ा को सब कुछ बताया — गैंग की फंडिंग, नकली भारतीय नोटों की स्मगलिंग नेपाल के रास्ते भारत तक, और वो सारे राज़ जो बाहरी दुनिया तक नहीं पहुंचने चाहिए थे।
जब रहमान डकैत ने ISI से हाथ मिलाया
असली मोड़ तब आया जब रहमान डकैत ने ISI के साथ मिलकर बलोच कनेक्शन का इस्तेमाल भारत पर आतंकी हमलों के लिए हथियार पहुंचाने में करने की कोशिश की। उस पल हमज़ा के लिए वफ़ादारी और मिशन के बीच कोई सवाल नहीं था — रहमान को खत्म करना ज़रूरी था। SP चौधरी असलम (संजय दत्त) और जमील जमाली के साथ मिलकर हमज़ा ने वो मोहरे चले जो उसने पहले से तय कर रखे थे।
धुरंधर 2 में हमज़ा लियारी का नया ‘किंग’ बना — लेकिन उसका ताज गैंगस्टर का नहीं, एक जासूस का था।
वो डायरी जो सब कुछ कहती है
गेम ऑफ थ्रोन्स में आर्या स्टार्क की ‘किल लिस्ट’ याद है? हमज़ा की भी एक ऐसी डायरी है — लेकिन वो लिखी जाती है अदृश्य स्याही से। जैसे-जैसे वो अपने टारगेट को खत्म करता है, उसका नाम उस डायरी से मिटता जाता है। जब पहली बार ‘बड़े साहब’ का नाम उसके कानों तक पहुंचा — पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क का एक बड़ा खिलाड़ी — वो नाम भी उस डायरी में दर्ज हो गया।
क्यों ज़रूरी था लियारी का ये रास्ता
अगर हमज़ा सीधे पाकिस्तानी आतंकियों तक पहुंचने की कोशिश करता, तो वो एक दिन भी नहीं टिक पाता। लियारी की गलियां, वहां के गैंग, वहां की राजनीति — यह सब उसकी असली ढाल थी। जो लियारी पर राज करे, वो कराची पर राज करे — और जो कराची पर राज करे, वो पाकिस्तान की नब्ज़ थाम ले। हमज़ा ने यही किया।
धुरंधर कभी सिर्फ गैंगवॉर की फ़िल्म नहीं थी। यह हमेशा से एक भारतीय जासूस की उस लंबी, खतरनाक और अकेली लड़ाई की कहानी थी — जो दुश्मन की ज़मीन पर, दुश्मन की भाषा में, दुश्मन का चेहरा लगाकर लड़ी जाती है।
