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Bakra Eid 2026 पर फिर चर्चा में आए Irrfan Khan के विचार, ‘qurbani सिर्फ जानवर की नहीं, खुद की भी होनी चाहिए’
ईद-उल-अजहा के मौके पर दिवंगत अभिनेता इरफान खान का पुराना बयान सोशल मीडिया पर वायरल, धर्म और आत्मचिंतन को लेकर कही थी बड़ी बात।
नई दिल्ली: ईद-उल-अजहा (बकरीद) 2026 के अवसर पर दिवंगत अभिनेता Irrfan Khan का एक पुराना बयान एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। अपनी शानदार अभिनय क्षमता के साथ-साथ बेबाक और विचारशील सोच के लिए पहचाने जाने वाले इरफान खान ने वर्षों पहले कुर्बानी और रमजान जैसे धार्मिक विषयों पर अपनी अलग राय रखी थी, जो आज भी लोगों के बीच बहस का कारण बनती है।
साल 2016 में अपनी फिल्म Madaari के प्रमोशन के दौरान इरफान ने कुर्बानी के वास्तविक अर्थ पर बात करते हुए कहा था कि केवल किसी जानवर की बलि देना ही कुर्बानी नहीं है। उनके अनुसार, सच्ची कुर्बानी वह है जिसमें इंसान अपनी किसी प्रिय चीज, आदत या स्वार्थ का त्याग करे।
इरफान का मानना था कि धर्म का मूल उद्देश्य इंसान को बेहतर बनाना है। उन्होंने कहा था कि धार्मिक परंपराओं का पालन करते समय उनके पीछे छिपे संदेश और मूल भावना को समझना भी उतना ही जरूरी है। यही वजह थी कि उनके विचारों ने कई लोगों को सोचने पर मजबूर किया।
उन्होंने रमजान के रोजों को लेकर भी आत्ममंथन की जरूरत पर जोर दिया था। इरफान का कहना था कि केवल औपचारिक धार्मिक गतिविधियों तक सीमित रहने के बजाय लोगों को अपने व्यवहार, सोच और जीवनशैली का भी मूल्यांकन करना चाहिए। उनके अनुसार, धर्म का असली उद्देश्य इंसान के भीतर सकारात्मक बदलाव लाना है।
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हालांकि, उस समय उनके बयानों पर कुछ धार्मिक संगठनों और धर्मगुरुओं ने आपत्ति भी जताई थी। कुछ लोगों ने उनके विचारों को व्यक्तिगत राय बताया, जबकि कई लोगों ने इसे धर्म के मानवीय और आध्यात्मिक पक्ष को समझने की कोशिश के रूप में देखा।

बाद के वर्षों में भी इरफान सामाजिक और वैश्विक मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखते रहे। आतंकवाद और धर्म के नाम पर फैलने वाली कट्टरता के खिलाफ उन्होंने कई बार चिंता जताई थी। उनका मानना था कि किसी भी धर्म की पहचान उसके मूल मूल्यों—दया, करुणा और मानवता—से होनी चाहिए।
साल 2020 में इरफान खान का निधन हो गया, लेकिन उनकी बातें आज भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी रहती हैं। बकरीद 2026 के अवसर पर उनके पुराने विचार फिर याद किए जा रहे हैं, जो यह संदेश देते हैं कि धार्मिक परंपराओं के साथ-साथ आत्मचिंतन और मानवीय संवेदनाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
