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होर्मुज़ जलडमरूमध्य में खतरनाक हालात: बारूदी सुरंगों की तलाश में लग सकते हैं हफ्ते, वैश्विक तेल आपूर्ति पर संकट
ईरान-इजरायल तनाव के बीच दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्ते में खदानों की आशंका, 20% तेल और LNG सप्लाई पर असर की चिंता
दुनिया के सबसे रणनीतिक समुद्री मार्गों में शामिल Strait of Hormuz एक बार फिर वैश्विक चिंता का केंद्र बन गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस अहम जलमार्ग में संभावित बारूदी सुरंगों (mines) की तलाश और उन्हें हटाने में कई हफ्ते लग सकते हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय शिपिंग और ऊर्जा आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस क्षेत्र में वास्तव में बारूदी सुरंगें बिछाई गई हैं, तो उन्हें सुरक्षित तरीके से हटाना बेहद जटिल और समय लेने वाला काम होगा। समुद्री खदानों की पहचान और निष्क्रिय करने के लिए विशेष नौसैनिक तकनीक और माइन-स्वीपिंग ऑपरेशन्स की जरूरत होती है, जिसमें कई देशों की नौसेनाएं शामिल हो सकती हैं।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य पहले से ही वैश्विक ऊर्जा व्यापार की “लाइफलाइन” माना जाता है। युद्ध से पहले यहां से दुनिया के कुल तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता था। ऐसे में यहां किसी भी तरह की बाधा सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेल की कीमतों को प्रभावित कर सकती है।
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सूत्रों के अनुसार, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि ईरान ने वास्तव में कितनी बारूदी सुरंगें बिछाई हैं या यह सिर्फ सुरक्षा खतरे का अनुमान है। लेकिन जोखिम इतना बड़ा माना जा रहा है कि कई शिपिंग कंपनियों ने पहले ही अपने जहाजों को वैकल्पिक मार्गों की ओर मोड़ने पर विचार शुरू कर दिया है।

अगर स्थिति और बिगड़ती है, तो इसका असर सिर्फ तेल सप्लाई पर नहीं, बल्कि एशिया, यूरोप और अमेरिका की ऊर्जा सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। खासकर भारत जैसे देशों के लिए, जो बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करते हैं, यह स्थिति आर्थिक दबाव बढ़ा सकती है।
नौसैनिक विशेषज्ञों का कहना है कि माइन हटाने की प्रक्रिया बेहद धीमी होती है। पहले पानी के भीतर संभावित खतरों की पहचान की जाती है, फिर विशेष रोबोटिक सिस्टम और माइन-डिटेक्शन जहाजों की मदद से उन्हें निष्क्रिय किया जाता है। इस पूरे ऑपरेशन में मौसम और सुरक्षा हालात भी बड़ी भूमिका निभाते हैं।
फिलहाल अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है और उम्मीद की जा रही है कि तनाव को कूटनीतिक स्तर पर जल्द नियंत्रित किया जाएगा, ताकि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर बड़ा संकट न खड़ा हो।
