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वेदांता का बड़ा दांव फिर भी हार गई Gautam Adani की ‘जल्दी पैसा’ वाली चाल ने कैसे जीती जयप्रकाश एसोसिएट्स की बाज़ी?
वेदांता ने ज्यादा पैसा लगाया, फिर भी बैंकों ने चुना अडानी को — विशेषज्ञ बोले, ‘IBC में सबसे ऊंची बोली नहीं, सबसे भरोसेमंद बोली जीतती है’; अनिल अग्रवाल ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया
नई दिल्ली। मान लीजिए आप अपना पुराना घर बेच रहे हैं। दो खरीदार आए — एक ने कहा 80 लाख दूंगा, लेकिन पाँच साल में किस्तों में। दूसरे ने कहा 75 लाख दूंगा, लेकिन आधा अभी नकद और बाकी दो साल में। आप किसे चुनेंगे?
यही सवाल था जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड (JAL) के दिवालिया मामले में — और बैंकों ने अडानी को चुना, वेदांता को नहीं।
कितना बड़ा है यह मामला?
जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड पर करीब 57,185 करोड़ रुपये का कर्ज था — यह भारत के बड़े दिवालिया मामलों में से एक है। NCLT की इलाहाबाद बेंच ने 17 मार्च 2026 को अडानी एंटरप्राइजेज की 14,535 करोड़ रुपये की रिजॉल्यूशन योजना को मंजूरी दी।
JAL की संपत्तियों में सीमेंट प्लांट, रियल एस्टेट, हॉस्पिटैलिटी और पावर प्रोजेक्ट शामिल हैं। नोएडा और ग्रेटर नोएडा में जयपी ग्रीन्स और जयपी विश टाउन जैसे मशहूर प्रोजेक्ट भी इसी कंपनी के हैं — जहाँ हजारों घर खरीदारों ने वर्षों से अपने घर का इंतजार किया है।
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अडानी ने क्या ऑफर दिया — और क्यों जीते?
अडानी एंटरप्राइजेज ने करीब 6,000 करोड़ रुपये तुरंत नकद देने का वादा किया और बाकी रकम दो साल में चुकाने की बात कही। वेदांता की तुलना में अडानी का NPV (नेट प्रेजेंट वैल्यू) कम था, लेकिन तेज़ भुगतान और ज्यादा अग्रिम राशि ने उन्हें बाज़ी जिता दी।
सीधी भाषा में — बैंकों ने सोचा कि कागज पर ज्यादा पैसा दिखाने वाले से बेहतर है वो जो अभी और तेज़ी से पैसा दे।
अडानी की योजना को लेनदारों की समिति (CoC) ने 89 से 93 प्रतिशत मतों से मंजूरी दी — जो एक भारी बहुमत है।
वेदांता का दावा — ‘हमारी बोली बेहतर थी’
वेदांता ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि उनकी संशोधित बोली अडानी के मुकाबले करीब 3,400 करोड़ रुपये ज्यादा थी और NPV में भी करीब 500 करोड़ रुपये अधिक।
लेकिन वेदांता की एक बड़ी कमजोरी यह थी — वेदांता की मूल योजना में भुगतान पाँच साल तक फैला हुआ था, जबकि अडानी ने दो साल का वादा किया।
और इससे भी बड़ी समस्या: वेदांता ने अपनी संशोधित बोली 8 नवंबर 2025 को जमा की — जबकि अंतिम बोलियाँ 7 नवंबर को ही बंद हो चुकी थीं। लेनदारों ने इस देरी से आई बोली को नियमों के खिलाफ मानकर खारिज कर दिया।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
दिवालिया कानून के जानकार और IBBI के पूर्व प्रमुख एम.एस. साहू ने कहा — “अगर IBC सिर्फ ‘सबसे ऊंची बोली जीतती है’ का फॉर्मूला होता, तो वोटिंग की जरूरत ही नहीं होती। IBC का असली मकसद पहले समाधान है, वसूली उसके बाद आती है।”
विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि वेदांता का पिछला रिकॉर्ड भी उनके खिलाफ गया। 2018 में वेदांता GMR छत्तीसगढ़ एनर्जी की सबसे ऊंची बोली लगाने के बाद सौदे से पीछे हट गए थे। इंड-बारथ एनर्जी में भी NCLT से मंजूरी मिलने के बाद वेदांता ने सौदा छोड़ दिया
यानी बैंकों के लिए सवाल यह नहीं था कि किसने ज्यादा बोली लगाई — सवाल यह था कि किस पर भरोसा किया जाए।
अनिल अग्रवाल का दर्द — ‘हमें लिखित में विजेता घोषित किया गया था’
वेदांता के CEO अनिल अग्रवाल ने सोशल मीडिया पर कहा — “यह एक पारदर्शी प्रक्रिया थी। हमें लिखित में बताया गया था कि हम जीत गए। लेकिन जिंदगी इतनी सरल नहीं होती। कुछ दिन बाद फैसला बदल दिया गया।” उन्होंने गीता का हवाला देते हुए कहा कि वो इस संपत्ति से कोई मोह नहीं रखते, लेकिन सच सामने लाएंगे।
हजारों घर खरीदारों को मिलेगी राहत?
अडानी की योजना में करीब 5,000 घर खरीदारों के लिए 2,074 करोड़ रुपये का प्रावधान है — जो लगभग एक दशक से अपने घरों का इंतजार कर रहे हैं।
अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर है — क्या वेदांता इस बाज़ी को पलट पाएगी, या अडानी का ‘जल्दी पैसा, भरोसेमंद इरादा’ वाला फॉर्मूला आखिरकार जीत का तमगा बना रहेगा?
