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Irrfan की आवाज़ आज भी सुनाई देती है Tigmanshu Dhulia बोले: वो कहता है, यह फ़िल्म बना
Irrfan Khan की चौथी पुण्यतिथि पर Tigmanshu Dhulia ने खोला दिल — K Asif की Biopic का सपना अब भी ज़िंदा है
कुछ दोस्तियाँ ज़िंदगी से भी लंबी होती हैं। Tigmanshu Dhulia और Irrfan Khan की दोस्ती भी कुछ ऐसी ही थी — जो मौत के बाद भी ख़त्म नहीं हुई।
29 अप्रैल 2020 को Irrfan Khan इस दुनिया से चले गए। एक दुर्लभ Neuroendocrine Tumour से लंबी जंग लड़ने के बाद, 54 साल की उम्र में। लेकिन उनके जाने के चार साल बाद भी, Tigmanshu Dhulia उन्हें भूल नहीं पाए हैं — और शायद भूलना चाहते भी नहीं।
Irrfan की चौथी पुण्यतिथि पर Mumbai में ‘Paan Singh Tomar’ Documentary “A Story That Refused to Die” की Special Screening हुई। इस मौके पर Tigmanshu Dhulia ने जो बात कही, वो सुनकर आँखें नम हो गईं।
उन्होंने कहा — “जिस फ़िल्म पर मैं काफ़ी वक़्त से काम कर रहा हूँ, उसकी शुरुआत Irrfan के साथ एक बातचीत से हुई थी। हमने तय किया था कि हम ‘Mughal-E-Azam’ के Director K Asif की Biopic साथ मिलकर बनाएंगे। वो आज नहीं है, लेकिन मुझे लगता है वो मुझे रोक नहीं रहा — बल्कि कह रहा है, ‘यह फ़िल्म बना।'”
यह बात सिर्फ़ एक Director की नहीं, एक पुराने दोस्त की है जो अपने यार का अधूरा सपना पूरा करना चाहता है।
दो दोस्त, एक सपना
Tigmanshu और Irrfan की दोस्ती तब शुरू हुई जब दोनों दिल्ली के National School of Drama में थे — 1980 के दशक के अंत में। वहाँ से जो रिश्ता बना, वो सिर्फ़ दोस्ती नहीं, एक Artistic Partnership थी।
Tigmanshu ने Irrfan को अपनी पहली फ़िल्म “Haasil” (2003) में Cast किया। फिर “Charas”, “Paan Singh Tomar” और “Saheb, Biwi Aur Gangster Returns” — हर फ़िल्म में दोनों ने मिलकर Hindi Cinema को एक नई भाषा दी। एक ऐसी भाषा जो सच्ची थी, ज़मीन से जुड़ी थी।
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Tigmanshu ने बताया — “हम फ़िल्म का एक Scene बैठकर सोचते थे, जो पूरी फ़िल्म की ‘सुर’ तय कर देता था। हर फ़िल्म में यही होता था।”
K Asif — वो शख़्स जिसने सिर्फ़ 5वीं तक पढ़कर इतिहास रच दिया
K Asif, यानी Karimuddin Asif — उत्तर प्रदेश के Etawah में जन्मे इस फ़िल्मकार ने केवल 5वीं कक्षा तक पढ़ाई की। लेकिन उन्होंने जो फ़िल्म बनाई — “Mughal-E-Azam” — वो 12 साल की मेहनत का नतीजा थी और आज भी Indian Cinema की सबसे बड़ी Masterpieces में गिनी जाती है। 1960 में आई इस फ़िल्म ने न सिर्फ़ Box Office तोड़े बल्कि एक पूरी पीढ़ी का दिल जीता।
Tigmanshu कहते हैं — “K Asif ने अपनी पूरी ज़िंदगी में ढाई फ़िल्में बनाईं, लेकिन वो सब Iconic थीं। ऐसे इंसान की कहानी कहना ज़रूरी है।”

और यही जुनून उन्हें आज भी इस Project से जोड़े रखता है।
Irrfan का जाना — एक ऐसा खालीपन जो भरता नहीं
Tigmanshu ने एक बार कहा था कि Irrfan के जाने के बाद वो Complex Characters और Scenes नहीं लिख पाते। जैसे उनकी Creativity का एक हिस्सा उनके साथ ही चला गया। लेकिन K Asif की Biopic उस दर्द को एक मकसद में बदल रही है।
यह फ़िल्म बनाना अब Tigmanshu के लिए सिर्फ़ एक Project नहीं — यह एक वादा है। एक दोस्त से किया हुआ वादा।
और जब कोई उनसे पूछता है कि क्या वो यह फ़िल्म बनाएंगे, तो Tigmanshu का जवाब होता है — “अगर कोई और इसे बनाने की कोशिश करे, तो मैं उसे नहीं छोडूँगा।” — एक हँसी के साथ, लेकिन इरादे में पूरी गंभीरता।
