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मेरे बिना इज़राइल नहीं होता! Trump के बड़े बयान से मचा हड़कंप, Netanyahu संग रिश्तों में दरार के संकेत
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि उनके समर्थन के बिना इज़राइल का अस्तित्व संभव नहीं था। लेबनान पर हमलों को लेकर नेतन्याहू को भी दी नसीहत।
वॉशिंगटन/तेल अवीव: वैश्विक राजनीति में एक बार फिर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान ने हलचल मचा दी है। G7 Summit के दौरान ट्रंप ने ऐसा दावा किया, जिसने न केवल मध्य पूर्व की राजनीति को गर्मा दिया बल्कि इज़राइल और अमेरिका के रिश्तों को लेकर भी नई बहस छेड़ दी।
ट्रंप ने कहा कि अगर अमेरिका और खासकर उनका समर्थन न होता, तो इज़राइल आज अस्तित्व में नहीं होता। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ उनके मतभेदों की खबरें लगातार सामने आ रही हैं।
“मेरे बिना इज़राइल नहीं बचता”
कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी के साथ बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि उन्होंने इज़राइल के लिए वह फैसले लिए, जिन्हें दूसरे अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने लेने से परहेज किया।
ट्रंप का कहना था कि अगर उन्होंने हस्तक्षेप नहीं किया होता, तो इज़राइल को गंभीर सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता था। उनका यह बयान उनके समर्थकों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है, जबकि आलोचक इसे अत्यधिक व्यक्तिगत श्रेय लेने की कोशिश मान रहे हैं।
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नेतन्याहू को ट्रंप की चेतावनी
हालांकि ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि उनके और नेतन्याहू के बीच लंबे समय से अच्छे संबंध रहे हैं, लेकिन उन्होंने इज़राइली नेतृत्व से संयम बरतने की अपील की।
विशेष रूप से लेबनान में इज़राइली सैन्य कार्रवाई को लेकर ट्रंप ने चिंता जताई। उनका मानना है कि इस तरह की कार्रवाई क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा सकती है तथा ईरान के साथ संभावित शांति समझौते के प्रयासों को नुकसान पहुंचा सकती है।
विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप का यह रुख दर्शाता है कि वे मध्य पूर्व में सैन्य कार्रवाई के बजाय कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देने का संदेश देना चाहते हैं।
लेबनान पर भी जताई चिंता
ट्रंप ने बातचीत के दौरान लेबनान की स्थिति पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि एक समय लेबनान शिक्षा, चिकित्सा और बौद्धिक क्षमता के लिए जाना जाता था, लेकिन वर्षों के संघर्ष और राजनीतिक अस्थिरता ने देश की स्थिति को प्रभावित किया है।

मध्य पूर्व विशेषज्ञों के अनुसार, लेबनान की आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियां पहले से ही गंभीर हैं और किसी भी सैन्य तनाव का असर पूरे क्षेत्र पर पड़ सकता है।
क्या अमेरिका-इज़राइल रिश्तों में बदलाव के संकेत?
ट्रंप और नेतन्याहू लंबे समय से एक-दूसरे के करीबी सहयोगी माने जाते रहे हैं। ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका ने कई ऐसे फैसले लिए थे, जिन्हें इज़राइल के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना गया, जिनमें यरुशलम को इज़राइल की राजधानी के रूप में मान्यता देना भी शामिल था।
लेकिन हाल के घटनाक्रम यह संकेत दे रहे हैं कि दोनों नेताओं के बीच कुछ मुद्दों पर मतभेद उभर रहे हैं। खासकर ईरान, लेबनान और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों पर दोनों की रणनीति अलग दिखाई दे रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में मध्य पूर्व की राजनीति और अमेरिका-इज़राइल संबंधों की दिशा काफी हद तक इन मतभेदों पर निर्भर कर सकती है।
वैश्विक राजनीति पर असर
ट्रंप का बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे मध्य पूर्व में बदलते समीकरणों के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। यदि अमेरिका और इज़राइल के शीर्ष नेतृत्व के बीच मतभेद गहराते हैं, तो इसका प्रभाव क्षेत्रीय सुरक्षा, ईरान वार्ता और व्यापक वैश्विक कूटनीति पर पड़ सकता है।
फिलहाल दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में ट्रंप और नेतन्याहू के रिश्ते किस दिशा में जाते हैं और क्या यह बयान किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की शुरुआत है।
