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कौन हैं राजेंद्र अर्लेकर? तमिलनाडु की सियासी जंग में क्यों चर्चा में हैं राज्यपाल
TVK प्रमुख विजय को सरकार बनाने का न्योता न मिलने पर बढ़ा विवाद, राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर के फैसलों पर उठ रहे सवाल।
तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव के बाद पैदा हुए राजनीतिक संकट के बीच राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर अचानक राष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बन गए हैं। राज्य में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के बाद सरकार गठन को लेकर सस्पेंस बना हुआ है, और इसी बीच TVK प्रमुख विजय को अब तक सरकार बनाने का न्योता नहीं मिलने पर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है।
TVK 234 सदस्यीय विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन बहुमत से कुछ सीटें पीछे रह गई। ऐसे में राज्यपाल की भूमिका बेहद अहम हो गई है। राजनीतिक दलों और संवैधानिक विशेषज्ञों के बीच अब बहस इस बात को लेकर है कि क्या सबसे बड़ी पार्टी को पहले सरकार बनाने का मौका मिलना चाहिए था।
गोवा से शुरू हुआ राजनीतिक सफर
राजेंद्र अर्लेकर का जन्म 23 अप्रैल 1954 को गोवा के पणजी में हुआ था। बचपन से ही उनका जुड़ाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से रहा। आपातकाल के दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा था।
उन्होंने 1989 में भारतीय जनता पार्टी जॉइन की और धीरे-धीरे गोवा में पार्टी संगठन के महत्वपूर्ण चेहरों में शामिल हो गए। उस दौर में मनोहर पर्रिकर, श्रीपद नाइक और लक्ष्मीकांत पारसेकर जैसे नेताओं के साथ मिलकर उन्होंने गोवा में BJP को मजबूत करने का काम किया।
हालांकि अर्लेकर खुद बड़े जननेता के बजाय संगठन के रणनीतिक नेता माने जाते रहे। उन्होंने गोवा BJP के महासचिव, दक्षिण गोवा अध्यक्ष और बाद में प्रदेश अध्यक्ष जैसे कई अहम पद संभाले।
विधायक से राज्यपाल तक का सफर
अर्लेकर पहली बार 2002 में गोवा विधानसभा पहुंचे। बाद में 2012 में Pernem सीट से दोबारा विधायक बने और उसी साल गोवा विधानसभा के स्पीकर भी बने।
इसके बाद उनका राजनीतिक करियर संवैधानिक पदों की ओर बढ़ा।
- 2021 में उन्हें हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया
- 2023 में बिहार के राज्यपाल बने
- जनवरी 2025 में केरल के राज्यपाल की जिम्मेदारी संभाली
- और मार्च 2026 में उन्हें तमिलनाडु का राज्यपाल नियुक्त किया गया
केरल में भी रहे विवादों में
केरल में राज्यपाल रहते हुए अर्लेकर कई बार विवादों में आए। विपक्षी दलों ने उन पर राजभवन को “RSS कार्यालय” की तरह इस्तेमाल करने का आरोप लगाया।
एक कार्यक्रम में भारत माता की तस्वीर और भगवा ध्वज को लेकर विवाद खड़ा हुआ था। इसके अलावा उन्होंने विधानसभा में सरकार के भाषण के कुछ हिस्सों को हटाया था, जिसमें केंद्र सरकार और राज्यपाल की आलोचना की गई थी।
इन घटनाओं के बाद विपक्ष ने आरोप लगाया कि राज्यपाल का पद राजनीतिक तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है।
तमिलनाडु में फैसले पर बढ़ी राजनीति
अब तमिलनाडु में भी अर्लेकर के फैसलों पर सवाल उठ रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने TVK प्रमुख विजय से 118 विधायकों का समर्थन पत्र लाने को कहा है, तभी सरकार बनाने का मौका मिलेगा।
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वहीं संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि परंपरा के मुताबिक सबसे बड़ी पार्टी को पहले मौका दिया जाना चाहिए और बहुमत का परीक्षण विधानसभा में होना चाहिए।
कांग्रेस और कई विपक्षी दलों ने राज्यपाल पर प्रक्रिया को धीमा करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि इससे अन्य दलों को जोड़-तोड़ का समय मिल रहा है।

अब सबकी नजर राजभवन पर
तमिलनाडु में सरकार कौन बनाएगा, इसका फैसला आने वाले कुछ दिनों में हो सकता है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका और राजनीतिक निष्पक्षता को राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना दिया है।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि तमिलनाडु में लिया गया फैसला राजेंद्र अर्लेकर की पहचान और राजनीतिक विरासत को लंबे समय तक प्रभावित कर सकता है।

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