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बिहार SIR क्यों बदला गेम प्लान मतदाता सूची में शामिल हुए लाखों नए वोटर
नागरिकता जांच जैसी प्रक्रिया से लेकर सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप और ईसी की नीतिगत सुधार तक, बिहार की मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया ने कई मोड़ देखे।
बिहार में मतदाता सूची का स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) इस बार कई मायनों में अलग रहा। चुनाव आयोग (EC) ने जून 2025 में जो आदेश जारी किया था, उसने शुरुआत में व्यापक विवाद खड़ा कर दिया। आदेश के तहत, 2003 की मतदाता सूची में शामिल न होने वाले लगभग 2.93 करोड़ लोगों को अपनी पात्रता साबित करने के लिए 11 दस्तावेज़ों में से किसी एक को दिखाना अनिवार्य था।
शुरुआत में उठे सवाल
इस प्रक्रिया को कई लोग नागरिकता जांच जैसा मान रहे थे। खासकर इसलिए क्योंकि इसमें आधार कार्ड, राशन कार्ड और यहां तक कि चुनाव आयोग का अपना EPIC कार्ड भी मान्य नहीं था। दिलचस्प बात यह रही कि 2003 के पिछले SIR में EPIC को स्वीकार किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट का दखल
नई व्यवस्था को तुरंत सुप्रीम कोर्ट में चुनौती मिली। चुनाव आयोग ने अपना बचाव करते हुए कहा कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है और फर्जी राशन कार्ड की समस्या गंभीर है। लेकिन अदालत ने नरमी बरतने को कहा और अंततः आधार को 12वें दस्तावेज़ के रूप में मान्यता दी गई।
जमीनी स्तर की चुनौतियाँ
गांवों और दूरदराज़ इलाकों में काम कर रहे बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLOs) ने रिपोर्ट दी कि आम लोगों के लिए इतने दस्तावेज़ जुटाना बेहद कठिन है। इससे भ्रम और असंतोष दोनों बढ़ रहे थे।

आयोग का बदलाव
इन चुनौतियों को देखते हुए EC ने रणनीति बदली। अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वे 2003 की मतदाता सूची से अधिक से अधिक लोगों को जोड़ने की कोशिश करें, भले ही यह उनके परिवार या रिश्तेदारों के ज़रिए हो।
- 52% लोग सीधे 2003 की लिस्ट में पाए गए
- 25% लोग रिश्तेदार या बच्चों के तौर पर जुड़े
बाकी लोगों को जोड़ने के लिए आयोग ने वंशावली रजिस्टर, महादलित विकास रजिस्टर और बिहार जाति सर्वे जैसे स्रोतों का इस्तेमाल किया।
अंतिम नतीजे
संशोधन के अंत में बड़ी संख्या में बदलाव हुए:
- 68.6 लाख नाम हटाए गए (मुख्यतः मौत, पलायन या डुप्लीकेट प्रविष्टियाँ)
- 21.5 लाख नए नाम जुड़े
अब बिहार की मतदाता सूची में कुल 7.42 करोड़ वोटर दर्ज हैं।
क्यों है यह अहम?
यह प्रक्रिया दिखाती है कि दस्तावेज़-आधारित प्रणाली कितनी पेचीदा हो सकती है, खासकर ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप और आयोग की लचीली नीतियों के कारण लाखों नए वोटरों को सूची में शामिल किया जा सका।
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