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युद्ध का असर: उर्वरक उद्योग पर बढ़ा दबाव, पैकेजिंग लागत में भारी उछाल से संकट गहराया
गैस, कच्चे माल और लॉजिस्टिक्स महंगे, उद्योग ने सरकार से मांगी राहत और नीतिगत समर्थन
पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर अब भारत के उर्वरक (फर्टिलाइज़र) सेक्टर पर साफ दिखाई देने लगा है। बढ़ती लागत, सप्लाई में रुकावट और कच्चे माल की कीमतों में उछाल ने उद्योग की चिंता बढ़ा दी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि स्थिति आने वाले महीनों में और गंभीर हो सकती है, अगर सरकार ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया।
गैस और आयात बना सबसे बड़ा जोखिम
एग्री एक्सपर्ट Aditya Sesh के अनुसार, उर्वरक उद्योग अभी भी 20–45% तक लागत दबाव झेल रहा है। गैस की कीमतों में अस्थिरता और आयात पर निर्भरता ने जोखिम को और बढ़ा दिया है।
पैकेजिंग लागत ने बढ़ाई परेशानी
उद्योग के सामने सबसे बड़ी नई चुनौती पैकेजिंग लागत बनकर उभरी है।
- HDPE पॉलिमर की कीमत ₹97–98/kg से बढ़कर ₹163/kg तक पहुंच गई
- मास्टरबैच की कीमत ₹220 से बढ़कर ₹340/kg हो गई
Pitamber Lal Sharma के मुताबिक, इससे HDPE बोतलों की लागत में करीब 70% तक बढ़ोतरी हुई है।
वहीं, Durgesh Agarwal का कहना है कि PP फैब्रिक, BOPP फिल्म और अन्य कच्चे माल की कीमतें 60–80% तक बढ़ गई हैं, जिससे सप्लाई चेन पर दबाव और बढ़ गया है।
कीमतों में और उछाल की आशंका
Rahul Mirchandani ने चेतावनी दी है कि अभी तक केवल 15% लागत ही ग्राहकों तक पहुंचाई गई है। अगर हालात ऐसे ही रहे, तो दूसरी तिमाही (Q2) में बड़ा प्राइस शॉक देखने को मिल सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में ‘Shrinkflation’ (कम मात्रा में उत्पाद देना) जैसी स्थिति भी बन सकती है।
नीतिगत बाधाएं भी बनी समस्या
उद्योग ने सरकार से कुछ अहम मांगें की हैं:
- निर्यात प्रतिबंधों में ढील
- नई उत्पाद मंजूरी प्रक्रिया में तेजी
- क्रेडिट सुविधा आसान करना
Suhas Buddhe ने कहा कि पैकेजिंग लागत कुछ मामलों में दोगुनी हो गई है, जबकि क्रेडिट और मंजूरी प्रक्रियाएं अभी भी धीमी हैं।
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वैकल्पिक उर्वरकों पर जोर
सरकार Nano Urea, ऑर्गेनिक फर्टिलाइज़र और रेजिड्यू-फ्री खेती को बढ़ावा दे रही है। साथ ही 200 से ज्यादा बायोफर्टिलाइज़र को फर्टिलाइज़र कंट्रोल ऑर्डर के तहत लाया गया है।

लेकिन उद्योग का कहना है कि:
- बायोफर्टिलाइज़र पर सब्सिडी नहीं है
- क्वालिटी कंट्रोल अभी भी चुनौती है
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती लागत, वैश्विक अनिश्चितता और नीति संबंधी चुनौतियों के बीच उर्वरक उद्योग एक अहम मोड़ पर खड़ा है।
अगर सरकार समय पर सब्सिडी और नीतिगत समर्थन देती है, तो यह संकट संभल सकता है—वरना इसका असर सीधे किसानों और कृषि उत्पादन पर पड़ सकता है।
