International News
India-US Critical Minerals Deal में चीन की बढ़ी टेंशन? Rare Minerals को लेकर बदल रही दुनिया की रणनीति
America अब China पर निर्भरता घटाना चाहता है, ऐसे में भारत के साथ नया समझौता बना सकता है बड़ा गेमचेंजर
दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच अब सिर्फ technology या trade की लड़ाई नहीं रह गई है, बल्कि असली मुकाबला उन critical minerals को लेकर शुरू हो चुका है जो भविष्य की तकनीकों की रीढ़ माने जाते हैं। इसी बीच भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती साझेदारी ने चीन की चिंता बढ़ा दी है।
हाल ही में India-US Critical Minerals Deal को लेकर चर्चा तेज हुई है। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य उन जरूरी खनिजों की सप्लाई को मजबूत करना है जिनका इस्तेमाल electric vehicles, smartphones, defence equipment और clean energy technology में होता है।
क्यों अहम हैं Critical Minerals?
Lithium, cobalt, nickel, graphite और rare earth elements जैसे खनिज आज दुनिया की सबसे बड़ी जरूरत बन चुके हैं। इलेक्ट्रिक कारों की बैटरी से लेकर मिसाइल सिस्टम और सेमीकंडक्टर तक, हर जगह इनका इस्तेमाल होता है।
और भी पढ़ें : ईरान ने Donald Trump को ‘एस्केलेशन ट्रैप’ में अलौकिक हड़ताल से फँसाया: अमेरिका अब संकट के ‘नर्क’ में
समस्या यह है कि दुनिया का बड़ा हिस्सा इन खनिजों के लिए अभी भी चीन पर निर्भर है। चीन कई सालों से mining, processing और सप्लाई चेन में अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए है।
यही वजह है कि अमेरिका अब वैकल्पिक साझेदारों की तलाश में जुटा हुआ है और भारत इस रणनीति में तेजी से महत्वपूर्ण बनता जा रहा है।
Trump दौर से शुरू हुई थी रणनीति
विशेषज्ञों के मुताबिक, चीन पर निर्भरता कम करने की रणनीति खासतौर पर Donald Trump administration के दौरान तेज हुई थी। अमेरिका को डर था कि अगर भविष्य में चीन सप्लाई रोकता है, तो कई महत्वपूर्ण उद्योग प्रभावित हो सकते हैं।
इसके बाद वॉशिंगटन ने अलग-अलग देशों के साथ नए समझौते शुरू किए ताकि critical minerals supply chain को ज्यादा सुरक्षित बनाया जा सके।
अब भारत के साथ बढ़ती साझेदारी को उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
भारत को क्या फायदा होगा?
भारत के पास कई महत्वपूर्ण खनिजों के भंडार मौजूद हैं और सरकार भी mineral exploration को बढ़ावा दे रही है। अगर भारत और अमेरिका के बीच यह सहयोग मजबूत होता है, तो इससे भारत को नई तकनीक, निवेश और वैश्विक सप्लाई चेन में बड़ी भूमिका मिल सकती है।
इसके अलावा भारत clean energy transition और electric vehicle manufacturing में भी तेजी से आगे बढ़ना चाहता है। ऐसे में यह साझेदारी आर्थिक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर फायदेमंद मानी जा रही है।

चीन की बढ़ सकती है चिंता
दुनिया के कई देश अब सप्लाई चेन को लेकर ज्यादा सतर्क हो गए हैं। कोरोना महामारी और वैश्विक तनावों ने यह साफ कर दिया कि किसी एक देश पर ज्यादा निर्भरता जोखिम पैदा कर सकती है।
ऐसे में अगर भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देश मिलकर नया नेटवर्क तैयार करते हैं, तो चीन की वैश्विक पकड़ को चुनौती मिल सकती है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि चीन अभी भी इस क्षेत्र में बेहद मजबूत स्थिति में है और उसे पूरी तरह रिप्लेस करना आसान नहीं होगा।
भविष्य की Geopolitics बदल सकती है यह डील
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में critical minerals वही महत्व रखने वाले हैं जो कभी तेल का हुआ करता था। इसलिए इन संसाधनों को लेकर देशों के बीच प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है।
भारत और अमेरिका की यह नई साझेदारी सिर्फ व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि भविष्य की वैश्विक राजनीति और तकनीकी शक्ति संतुलन का बड़ा संकेत भी मानी जा रही है।
