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पश्चिम बंगाल पर 8.15 लाख करोड़ का कर्ज़! क्या Swapan Dasgupta का ‘मार्शल प्लान’ बदल देगा बंगाल की तस्वीर?
नए वित्त मंत्री Swapan Dasgupta ने आम जनता पर कोई नया टैक्स बोझ डाले बिना राज्य की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का खाका तैयार किया है, जिसकी तुलना वे दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप के पुनर्निर्माण से जुड़ी ऐतिहासिक ‘मार्शल प्लान’ योजना से कर रहे हैं।
पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था को इस समय एक बड़े सहारे की ज़रूरत है, और राज्य के नए वित्त मंत्री Swapan Dasgupta इसके लिए एक बड़ा खाका तैयार कर रहे हैं। पहली बार मंत्री बने Dasgupta का कहना है कि उनकी प्राथमिकता ऐसे रास्ते तलाशना है जिनसे राज्य को नया रेवेन्यू मिले, मगर आम आदमी की जेब पर इसका कोई अतिरिक्त भार न पड़े। उनका मानना है कि राज्य की आर्थिक गतिविधियों को फिर से रफ्तार देने के लिए वित्तीय अनुशासन, निवेश और संस्थागत सहयोग की तिकड़ी जरूरी है।
अपनी सोच को समझाने के लिए Dasgupta ने इतिहास के मशहूर ‘मार्शल प्लान’ का उदाहरण दिया। दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब वेस्ट जर्मनी समेत कई यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्थाएं तबाह हो गई थीं, तब अमेरिका ने अपने विदेश मंत्री George Marshall की अगुवाई में एक बड़ी आर्थिक मदद योजना शुरू की थी। इस योजना के तहत वित्तीय सहायता, कर्ज़ और तकनीकी सहयोग दिया गया, जिससे वेस्ट जर्मनी ने आधुनिक इतिहास की सबसे शानदार आर्थिक वापसी की – औद्योगिक उत्पादन बढ़ा, व्यापार में जान आई और बेरोजगारी कम हुई।
इसी तर्ज पर Dasgupta का मानना है कि बंगाल को भी एक तरह के “अंदरूनी मार्शल प्लान” की ज़रूरत है, जिसमें केंद्र का सहयोग, वित्तीय संस्थानों से फंडिंग और केंद्रीय योजनाओं का सही क्रियान्वयन शामिल हो। उनका कहना है कि अगर MGNREGA (100 दिन रोज़गार योजना), Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana और आवास योजनाओं को समय पर मंज़ूरी मिले और सही ढंग से लागू किया जाए, तो इससे राज्य की अर्थव्यवस्था में बड़ी मात्रा में पैसा आ सकता है, मांग बढ़ सकती है और रोज़गार के मौके पैदा हो सकते हैं।
साथ ही, निजी निवेश को आकर्षित करना भी सरकार की रणनीति का एक अहम हिस्सा है। सूत्रों के मुताबिक, Larsen & Toubro जैसी बड़ी कंपनियों ने भी बंगाल में निवेश को लेकर दिलचस्पी दिखाई है। अगर ये योजनाएं हकीकत बनती हैं, तो इससे औद्योगिक विकास, रोज़गार और लंबी अवधि के आर्थिक सुधार को बड़ी मदद मिल सकती है।
लेकिन असली चुनौती इस सोच को ज़मीन पर उतारने की है। बंगाल पर अभी भी भारी वित्तीय दबाव बना हुआ है। नए वित्त मंत्री इन मुश्किलों से कैसे निपटते हैं, यही आने वाले समय में सबसे बड़ा सवाल रहेगा।
बंगाल पर कर्ज़ का बोझ कितना भारी?
देश के सबसे ज्यादा कर्ज़दार राज्यों में आज पश्चिम बंगाल का नाम सबसे ऊपर है। वित्त आयोग की रिपोर्टों के मुताबिक, Kerala और Punjab के साथ बंगाल भी सबसे ज्यादा कर्ज़ में डूबे राज्यों में शामिल है। राज्य पर कुल बकाया कर्ज़ लगभग 8.15 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो भारत के बड़े राज्यों में सबसे ज्यादा है।
हालांकि, debt-to-GSDP रेशियो के मामले में फर्क है। Punjab का यह आंकड़ा सबसे ज्यादा करीब 46-47 प्रतिशत है, जबकि बंगाल का लगभग 38-39 प्रतिशत और Kerala का 33-38 प्रतिशत के बीच है। लेकिन कुल कर्ज़ की रकम के मामले में बंगाल सबसे आगे है।
Reserve Bank of India बार-बार इन राज्यों को “हाई-स्ट्रेस्ड” यानी अत्यधिक तनाव वाले राज्यों की श्रेणी में रख चुका है। बंगाल के कर्ज़ की चिंता नई नहीं है – यह मुद्दा Mamata Banerjee के पहले के कार्यकाल से चला आ रहा है, जब Pranab Mukherjee केंद्र में वित्त मंत्री थे।
उस दौर में राज्य के कर्ज़ पुनर्गठन को लेकर एक कमेटी भी बनी थी और कई बैठकें हुई थीं, लेकिन Pranab Mukherjee का रुख व्यावहारिक रहा – उनका कहना था कि अगर बंगाल को विशेष छूट दी गई, तो Punjab जैसे राज्य भी ऐसी ही मांग करेंगे। समय के साथ GST लागू होने और केंद्र-राज्य के बदलते राजनीतिक समीकरणों ने मामले को और जटिल बना दिया।
2014 में Narendra Modi सरकार आने के बाद PM Modi ने राज्यों से बार-बार Ayushman Bharat जैसी केंद्रीय योजनाएं अपनाने की अपील की, लेकिन राजनीतिक मतभेदों के चलते कई बार सहमति नहीं बन पाई और फंडिंग में रुकावटें आती रहीं। NITI Aayog समेत कई आर्थिक संस्थानों ने भी समय-समय पर क्रियान्वयन में कमियों की ओर इशारा किया, लेकिन यह मुद्दा धीरे-धीरे आर्थिक से ज्यादा राजनीतिक बन गया।
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असली समस्या – ‘अनुत्पादक’ कर्ज़
आज बंगाल की सबसे बड़ी समस्या सिर्फ कर्ज़ का ज्यादा होना नहीं है, बल्कि यह है कि इसका बड़ा हिस्सा “अनुत्पादक” यानी non-productive माना जा रहा है। इसकी तीन बड़ी वजहें हैं:
पहली – राजस्व खर्च का बोलबाला: राज्य के 90 प्रतिशत से ज्यादा खर्च सैलरी, पेंशन, सब्सिडी और कल्याण योजनाओं पर जाता है। Lakshmir Bhandar जैसी नकद सहायता योजनाएं भी इसमें बड़ा हिस्सा रखती हैं।
दूसरी – ब्याज का भारी बोझ: हर साल राज्य अपनी कमाई का करीब 45,000 करोड़ रुपये सिर्फ ब्याज चुकाने में खर्च करता है। यानी राज्य के खुद के रेवेन्यू का लगभग 42 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ कर्ज़ की किस्तों में चला जाता है।
तीसरी – कैपिटल खर्च में कमज़ोरी: हालांकि निवेश पर खर्च थोड़ा बढ़ा है, लेकिन यह बहुत कम स्तर से शुरू हुआ था और अभी भी इतना नहीं है कि लंबी अवधि का आर्थिक विकास हो सके।
पांच-सूत्री रोडमैप क्या कहता है?

इन समस्याओं से निपटने के लिए NITI Aayog की मदद से एक पांच-चरणीय रोडमैप पर चर्चा चल रही है। इसमें अर्थशास्त्री Ashok Lahiri, जो अभी Vice Chairman की भूमिका में हैं, अहम समन्वयक की भूमिका निभा सकते हैं। केंद्र और राज्य में अब एक ही पार्टी की सरकार होने से समर्थकों का मानना है कि “डबल इंजन सरकार” का फॉर्मूला आपसी तकरार कम कर सकता है।
प्रमुख प्रस्तावों में शामिल हैं:
- रेवेन्यू बढ़ाना: बंगाल का खुद का टैक्स रेवेन्यू GSDP के अनुपात में Maharashtra जैसे राज्यों से कम है। टैक्स लीकेज रोकने, टैक्स बेस बढ़ाने, प्रोफेशनल टैक्स में सुधार और स्टैम्प ड्यूटी को आधुनिक बनाने से अगले कुछ वर्षों में सालाना 20,000-30,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त कमाई हो सकती है।
- वेलफेयर खर्च को व्यवस्थित करना: कल्याण योजनाएं बंद होने के आसार नहीं हैं, बल्कि कुछ नई योजनाओं का वादा भी है। लेकिन योजना यह है कि लंबी अवधि के लाभों को स्किल डेवलपमेंट और रोज़गार सृजन से जोड़ा जाए।
- एसेट मोनेटाइजेशन: राज्य के पास Kolkata, Haldia जैसे इलाकों में बेकार पड़ी सरकारी ज़मीन और कई सार्वजनिक उपक्रम हैं, जिनके सही उपयोग या पुनर्गठन से एकमुश्त वित्तीय फायदा हो सकता है।
- निजी निवेश बढ़ाना: BJP का जोर सिर्फ वेलफेयर पॉलिटिक्स के बजाय मैन्युफैक्चरिंग और रोज़गार सृजन पर है। Tajpur Port, Deocha-Pachami कोयला परियोजना, औद्योगिक क्लस्टर और पोर्ट-लॉजिस्टिक्स सेक्टर इसके केंद्र में रह सकते हैं।
- कर्ज़ पुनर्गठन और केंद्रीय सहायता: केंद्र से लंबी अवधि के सस्ते कर्ज़ की मांग पर भी चर्चा हो रही है, जिससे महंगे पुराने कर्ज़ को सस्ती दर पर बदलकर सालाना हज़ारों करोड़ रुपये की बचत हो सकती है।
दूसरे राज्यों से सीख
अन्य राज्यों के उदाहरण भी काफी कुछ बताते हैं। Gujarat का कर्ज़ अनुपात कम है क्योंकि वहां ज्यादा खर्च उत्पादक क्षेत्रों में जाता है। Odisha को माइनिंग रेवेन्यू और वित्तीय अनुशासन से फायदा मिलता है, जबकि Tamil Nadu में कर्ज़ के साथ-साथ लगातार औद्योगिक निवेश भी जारी है।
बंगाल की राह अलग है। सिर्फ वेलफेयर खर्च के सहारे कर्ज़ कम होने की उम्मीद नहीं की जा सकती – इसके लिए आर्थिक विकास की रफ्तार खुद तेज़ करनी होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि हर तीन रुपये के राजस्व खर्च पर कम से कम एक रुपया कैपिटल खर्च की ओर मोड़ना होगा, और GSDP ग्रोथ को 8 प्रतिशत या उससे ज्यादा तक पहुंचाना होगा। ऐसा न होने पर कर्ज़ का स्तर आने वाले सालों तक 35 प्रतिशत के आसपास बना रह सकता है।
फिलहाल लक्ष्य कर्ज़ में नाटकीय कमी का नहीं, बल्कि स्थिरता लाने का है। यही वजह है कि नए मुख्यमंत्री और नए वित्त मंत्री की भूमिका इस वक्त बेहद अहम हो गई है। रोडमैप कागज़ पर तैयार है – असली सवाल यह है कि क्या नीति, राजनीति और क्रियान्वयन आखिरकार एक ही दिशा में चल पाएंगे।
