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Trump की चीन यात्रा से पहले बढ़ा तनाव क्या ईरान और ताइवान पर बदलने वाला है दुनिया का समीकरण
डोनाल्ड ट्रंप 13 मई से चीन दौरे पर रहेंगे, जहां शी जिनपिंग के साथ व्यापार, ईरान संकट और ताइवान जैसे बड़े मुद्दों पर अहम बातचीत होने की उम्मीद है।
अमेरिका और चीन के बीच रिश्ते एक बार फिर दुनिया की सबसे बड़ी चर्चा बन गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump 13 मई से 15 मई तक चीन के दौरे पर जा रहे हैं और इस यात्रा को केवल एक औपचारिक मुलाकात नहीं माना जा रहा। माना जा रहा है कि यह दौरा आने वाले महीनों में वैश्विक राजनीति की दिशा तय कर सकता है।
करीब एक दशक बाद कोई मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति चीन की आधिकारिक यात्रा कर रहा है। इससे पहले ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में साल 2017 में चीन का दौरा किया था। इस बार हालात पहले से काफी अलग हैं। दुनिया एक साथ कई मोर्चों पर तनाव झेल रही है — मध्य पूर्व में ईरान संकट, ताइवान को लेकर बढ़ती टकराहट और अमेरिका-चीन के बीच व्यापारिक खींचतान।
दिलचस्प बात यह है कि चीन को लेकर लगातार सख्त बयान देने वाले ट्रंप ने हाल ही में चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping की खुलकर तारीफ की। उन्होंने शी जिनपिंग को “स्मार्ट” और “अच्छा इंसान” बताते हुए कहा कि दोनों के बीच “बहुत अच्छे रिश्ते” हैं। लेकिन राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इन तारीफों के पीछे अमेरिका की रणनीतिक मजबूरी भी छिपी हो सकती है।
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ईरान संकट बना सबसे बड़ा मुद्दा
ट्रंप की इस यात्रा पर सबसे बड़ा साया ईरान संकट का माना जा रहा है। अमेरिका पिछले कई हफ्तों से चीन पर दबाव बना रहा है कि वह ईरान को बातचीत की मेज पर लाने में मदद करे। खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर तनाव बढ़ने के बाद वॉशिंगटन की चिंता और गहरी हो गई है।
दुनिया के बड़े तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से गुजरता है। अगर यहां हालात बिगड़ते हैं तो तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है और इसका असर भारत समेत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन का ईरान पर प्रभाव अमेरिका से कहीं ज्यादा है। चीन ईरान का बड़ा आर्थिक साझेदार है और दोनों देशों के बीच ऊर्जा और निवेश को लेकर गहरे संबंध हैं। ऐसे में ट्रंप चाहते हैं कि शी जिनपिंग तेहरान पर दबाव डालें ताकि हालात काबू में रह सकें।

ताइवान और व्यापार भी रहेंगे चर्चा में
ईरान के अलावा ताइवान का मुद्दा भी इस मुलाकात का अहम हिस्सा रहने वाला है। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने ताइवान के आसपास अपनी सैन्य गतिविधियां तेज की हैं, जबकि अमेरिका लगातार ताइवान का समर्थन करता रहा है। यही वजह है कि बीजिंग और वॉशिंगटन के रिश्तों में तनाव लगातार बना हुआ है।
इसके साथ-साथ व्यापारिक विवाद भी दोनों देशों के बीच एक बड़ा मुद्दा है। ट्रंप लंबे समय से चीन पर अमेरिकी कंपनियों के साथ अनुचित व्यापार व्यवहार का आरोप लगाते रहे हैं। हालांकि इस बार उनकी भाषा पहले की तुलना में थोड़ी नरम दिखाई दे रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप अब केवल टकराव की राजनीति नहीं करना चाहते, बल्कि वे चीन के साथ ऐसा समझौता चाहते हैं जिससे अमेरिका को आर्थिक और रणनीतिक दोनों स्तर पर फायदा मिल सके।
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दुनिया की नजर इस मुलाकात पर
पूरी दुनिया की नजर अब बीजिंग में होने वाली इस हाई-प्रोफाइल बैठक पर टिकी हुई है। अगर ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच किसी बड़े समझौते की शुरुआत होती है तो इसका असर वैश्विक बाजारों से लेकर तेल की कीमतों और एशिया की सुरक्षा तक पर पड़ सकता है।
भारत के लिए भी यह यात्रा काफी अहम मानी जा रही है। क्योंकि भारत एक तरफ अमेरिका का रणनीतिक साझेदार है तो दूसरी तरफ चीन उसका पड़ोसी और बड़ा व्यापारिक भागीदार भी है। ऐसे में बीजिंग और वॉशिंगटन के रिश्तों में आने वाला बदलाव नई दिल्ली की विदेश नीति को भी प्रभावित कर सकता है।
फिलहाल इतना तय है कि ट्रंप का यह चीन दौरा केवल एक कूटनीतिक यात्रा नहीं बल्कि वैश्विक ताकतों के बीच नए समीकरण बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
