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भारत ने बदली FDI नीति: चीन समेत पड़ोसी देशों के निवेश पर ढील, जानिए किसे होगा सबसे ज्यादा फायदा
मोबाइल कंपोनेंट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और रेयर अर्थ मैग्नेट जैसे सेक्टर में निवेश बढ़ाने की कोशिश; सुरक्षा संतुलन के साथ आर्थिक मजबूती का नया रास्ता
भारत सरकार ने विदेशी निवेश को लेकर एक अहम कदम उठाया है। केंद्र ने हाल ही में जमीन से सीमा साझा करने वाले देशों (Land Bordering Countries) के लिए FDI यानी विदेशी प्रत्यक्ष निवेश नीति में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। यह बदलाव खासतौर पर उन सेक्टरों को ध्यान में रखकर किया गया है, जहां भारत अभी भी बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, जैसे इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, मोबाइल पार्ट्स और रेयर अर्थ मैग्नेट।
सरकार का मानना है कि इस नई नीति से भारत में निवेश बढ़ेगा, टेक्नोलॉजी आएगी और देश की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता मजबूत होगी। खास बात यह है कि यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब भारत और चीन के रिश्तों को स्थिर करने की कोशिशें भी चल रही हैं।
2020 में क्यों लगाया गया था प्रतिबंध?
साल 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान भारत सरकार ने एक अहम फैसला लिया था। उस समय सरकार ने यह नियम लागू किया कि जो भी देश भारत से जमीन के जरिए सीमा साझा करते हैं, वहां से आने वाला निवेश केवल सरकारी मंजूरी (Government Route) से ही संभव होगा।
इस नियम को Press Note 3 (PN3) कहा गया। इसका मकसद था कि महामारी के दौरान जब भारतीय कंपनियों के शेयर सस्ते हो रहे थे, तब विदेशी कंपनियां सस्ते में भारतीय कंपनियों को खरीद न लें।
हालांकि यह नियम सभी पड़ोसी देशों पर लागू था, लेकिन असल में इसका सबसे ज्यादा असर चीन के निवेशकों पर पड़ा, क्योंकि भारत में निवेश करने वाले पड़ोसी देशों में चीन सबसे बड़ा निवेशक रहा है।
अब क्या बदला है नई नीति में?
सरकार ने अब इस नीति में कुछ “कैलिब्रेटेड” यानी संतुलित बदलाव किए हैं। इन बदलावों के तहत कुछ अहम फैसले लिए गए हैं।
सबसे पहला बड़ा बदलाव यह है कि कुछ खास सेक्टरों में आने वाले निवेश प्रस्तावों को 60 दिनों के भीतर मंजूरी या फैसला देना अनिवार्य होगा। इससे निवेश प्रक्रिया तेज होने की उम्मीद है।
दूसरा अहम बदलाव यह है कि यदि किसी विदेशी फंड या कंपनी में सीमा से जुड़े देशों की हिस्सेदारी 10% से कम है, तो उस निवेश को अब ऑटोमेटिक रूट के जरिए अनुमति मिल सकती है।
इसका फायदा खास तौर पर उन वैश्विक निवेश फंड्स को मिलेगा जिनमें मामूली चीनी हिस्सेदारी होती है।
किन सेक्टरों को मिलेगा सबसे ज्यादा फायदा?
सरकार ने कुछ खास क्षेत्रों को इस नीति के तहत प्राथमिकता दी है। इनमें शामिल हैं:
- इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग
- इलेक्ट्रॉनिक कैपिटल गुड्स
- पॉलीसिलिकॉन और वेफर निर्माण
- एडवांस बैटरी कंपोनेंट्स
- रेयर अर्थ मैग्नेट और उनका प्रोसेसिंग
ये वे सेक्टर हैं जिनमें भारत अभी भी काफी हद तक आयात पर निर्भर है।
उदाहरण के लिए, रेयर अर्थ तत्व कई महत्वपूर्ण उद्योगों में इस्तेमाल होते हैं, जैसे:

रक्षा उपकरण- इलेक्ट्रिक वाहन
- मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स
- ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री
इन क्षेत्रों में निवेश आने से भारत को तकनीक और पूंजी दोनों मिल सकती हैं।
भारतीय कंपनियों के लिए क्या शर्त रखी गई?
सरकार ने सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए एक महत्वपूर्ण शर्त भी रखी है।
नई नीति के अनुसार इन संवेदनशील सेक्टरों में बनने वाले जॉइंट वेंचर में भारतीय कंपनियों की हिस्सेदारी कम से कम 51% रहनी चाहिए। यानी कंपनी का नियंत्रण भारतीय पक्ष के पास ही रहेगा।
इससे सरकार का उद्देश्य साफ है — विदेशी पूंजी और तकनीक आए, लेकिन नियंत्रण भारत के हाथ में रहे।
उद्योग जगत क्यों खुश है?
कई सालों से भारतीय उद्योग संगठन यह मांग कर रहे थे कि 2020 में लागू किए गए नियमों में कुछ ढील दी जाए।
दरअसल कई वैश्विक निवेश फंड्स जैसे BlackRock और Carlyle जैसे बड़े निवेशकों में छोटी-सी चीनी हिस्सेदारी होने के कारण उन्हें भी सरकारी मंजूरी लेनी पड़ती थी। इससे निवेश प्रक्रिया धीमी हो जाती थी।
नई नीति के बाद ऐसे फंड्स के लिए भारत में निवेश करना आसान हो जाएगा।
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मिल सकती है नई गति
भारत सरकार पिछले कुछ वर्षों से “मेक इन इंडिया” और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं के जरिए मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा दे रही है।
नई FDI नीति को भी उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में पहले से ही कुछ साझेदारियां शुरू हो चुकी हैं। उदाहरण के लिए भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी Dixon Technologies ने चीन की कंपनी Longcheer के साथ मिलकर एक जॉइंट वेंचर शुरू किया है।
इस नई कंपनी में Dixon की हिस्सेदारी लगभग 74% है जबकि Longcheer के पास 26% हिस्सा है।
यह कंपनी स्मार्टफोन, टैबलेट, स्मार्टवॉच और ऑटोमोबाइल इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे उत्पाद बनाने पर काम करेगी।
क्या इससे भारत-चीन रिश्तों पर भी असर पड़ेगा?
पिछले कुछ वर्षों में भारत और चीन के संबंधों में तनाव रहा है। लेकिन हाल के समय में दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधारने की कोशिशें भी हुई हैं।
इसी कड़ी में कई कदम उठाए गए हैं, जैसे:
- कैलाश मानसरोवर यात्रा को फिर से शुरू करने की योजना
- दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानों की बहाली
- पत्रकारों और शोधकर्ताओं को वीजा देना
- सीमा पार नदियों के डेटा साझा करना
FDI नीति में ढील को भी कुछ विशेषज्ञ इसी कूटनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा मान रहे हैं।
विशेषज्ञों की क्या राय है?
ट्रेड विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारत के लिए एक अवसर हो सकता है।
हालांकि कुछ विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि शुरुआत में विदेशी कंपनियां केवल कुछ हिस्सों का निर्माण भारत में कर सकती हैं, जबकि उच्च तकनीक वाले हिस्से अपने देश में ही बनाएंगी।
इसके बावजूद यह नीति भारत के लिए मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाने और वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी हिस्सेदारी मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
आगे क्या उम्मीद की जा सकती है?
सरकार का उद्देश्य साफ है — भारत को एक बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना।
यदि इस नीति के तहत निवेश बढ़ता है तो आने वाले वर्षों में भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी टेक्नोलॉजी और ऑटोमोबाइल सेक्टर में नई फैक्ट्रियां लग सकती हैं।
इससे रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे और भारत की निर्यात क्षमता भी मजबूत होगी।
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