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Trump से बातचीत के लिए ईरान ने अपनाया अनोखा दांव! रिपोर्ट में खुलासा सीनियर मनोवैज्ञानिकों की ली गई मदद…
ईरान-अमेरिका वार्ता को लेकर चौंकाने वाला दावा, बातचीत की रणनीति तैयार करने में मनोविज्ञान विशेषज्ञों की भूमिका सामने आई।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दुनिया में अक्सर ऐसी रणनीतियां अपनाई जाती हैं जो आम लोगों को हैरान कर देती हैं। अब एक नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि Iran ने अमेरिका के साथ संवेदनशील बातचीत के दौरान अपनी रणनीति मजबूत करने के लिए वरिष्ठ मनोवैज्ञानिकों की मदद ली थी।
रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी अधिकारियों ने वार्ता प्रक्रिया के दौरान ऐसे विशेषज्ञों को शामिल किया जो मानव व्यवहार, निर्णय लेने की प्रक्रिया और बातचीत के दौरान सामने वाले पक्ष की मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रियाओं को समझने में दक्ष हैं। बताया गया है कि यह पहल अप्रैल में Islamabad में हुई शुरुआती द्विपक्षीय वार्ताओं के बाद शुरू की गई थी।
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सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि इन मनोविज्ञान विशेषज्ञों ने ईरानी वार्ताकारों को यह समझने में मदद की कि अमेरिकी नेतृत्व और विशेष रूप से Donald Trump जैसी मजबूत राजनीतिक शख्सियत के साथ बातचीत के दौरान किस तरह की रणनीति अधिक प्रभावी हो सकती है।
कूटनीति में मनोविज्ञान का बढ़ता इस्तेमाल
विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक कूटनीति केवल राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों तक सीमित नहीं रह गई है। अब देशों के बीच होने वाली उच्च स्तरीय वार्ताओं में व्यवहार विज्ञान और मनोविज्ञान का महत्व भी तेजी से बढ़ रहा है।
ऐसे विशेषज्ञ बातचीत के दौरान शब्दों के चयन, प्रतिक्रिया के समय, दबाव की स्थिति और नेतृत्व की निर्णय लेने की शैली का विश्लेषण करते हैं। इससे वार्ताकारों को अपने तर्क अधिक प्रभावी ढंग से रखने में मदद मिलती है।
ट्रंप फैक्टर पर विशेष फोकस?
रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि ईरानी पक्ष ने विशेष रूप से ट्रंप की बातचीत की शैली, सार्वजनिक बयानों और फैसले लेने के तरीके को समझने की कोशिश की। माना जा रहा है कि इसी वजह से अनुभवी मनोवैज्ञानिकों को वार्ता टीम के साथ जोड़ा गया।

हालांकि इस दावे पर न तो ईरान और न ही अमेरिका की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई है। फिर भी यह रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में मनोविज्ञान की बढ़ती भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ सकती है।
वैश्विक राजनीति में नया ट्रेंड?
विश्लेषकों का कहना है कि यदि यह दावा सही साबित होता है, तो यह दिखाता है कि आधुनिक दौर में देशों के बीच होने वाली वार्ताएं केवल तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर नहीं, बल्कि मानवीय व्यवहार और मनोवैज्ञानिक समझ के आधार पर भी संचालित हो रही हैं।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अन्य देश भी संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं के लिए इसी तरह के विशेषज्ञों की सेवाएं लेने लगते हैं।
