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ईरान युद्ध में बड़ा खुलासा: इज़राइल ने गुपचुप तरीके से अज़रबैजान में तैनात कीं “एलीट” टुकड़ियाँ
नई रिपोर्ट में दावा: सीमा पार ऑपरेशंस के लिए पड़ोसी देशों का इस्तेमाल, तेहरान तक पहुंच बनाने की रणनीति
मध्य-पूर्व की जटिल भू-राजनीति एक बार फिर सुर्खियों में है। ताज़ा रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि Israel ने कथित तौर पर अपने elite यानी विशेष प्रशिक्षण प्राप्त सैनिकों की कुछ यूनिट्स को गुपचुप तरीके से Azerbaijan में तैनात किया था, ताकि Iran के खिलाफ चल रहे तनाव और संभावित युद्ध परिस्थितियों में रणनीतिक बढ़त हासिल की जा सके।
रिपोर्ट के अनुसार, यह तैनाती किसी बड़े सार्वजनिक सैन्य अभियान का हिस्सा नहीं थी, बल्कि इसे covert operations यानी गुप्त सैन्य गतिविधियों के रूप में अंजाम दिया गया। माना जा रहा है कि इन तैनातियों का उद्देश्य ईरान के उत्तरी क्षेत्रों और राजधानी तेहरान तक खुफिया पहुंच बनाना था।
पड़ोसी देशों की भूमिका पर सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि ईरान-इज़राइल तनाव में केवल दो देश ही नहीं, बल्कि आसपास के कई देश भी अप्रत्यक्ष रूप से भूमिका निभा रहे हैं। खासतौर पर अज़रबैजान की भौगोलिक स्थिति इसे रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है, क्योंकि यह ईरान की उत्तरी सीमा से जुड़ा हुआ है।
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कुछ रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि ऐसे ऑपरेशंस में पड़ोसी देशों का इस्तेमाल नई बात नहीं है, लेकिन इस बार जिस पैमाने पर गतिविधियों की बात सामने आ रही है, वह काफी असामान्य मानी जा रही है।
रणनीतिक बढ़त की कोशिश
सूत्रों के हवाले से यह भी कहा गया है कि इन elite units को सीमित लेकिन अत्यधिक संवेदनशील मिशनों के लिए तैयार किया गया था। इनमें निगरानी, खुफिया जानकारी इकट्ठा करना और संभावित सैन्य ठिकानों की पहचान जैसे कार्य शामिल हो सकते हैं।

हालांकि, अब तक न तो इज़राइल और न ही अज़रबैजान की सरकार की ओर से इन दावों की आधिकारिक पुष्टि की गई है। वहीं ईरान ने पहले भी ऐसे किसी भी विदेशी सैन्य हस्तक्षेप को अपनी संप्रभुता के खिलाफ बताया है।
क्षेत्रीय तनाव और बढ़ती चिंताएँ
मध्य-पूर्व पहले से ही कई मोर्चों पर तनाव का सामना कर रहा है। ऐसे में इस तरह की रिपोर्टें स्थिति को और अधिक संवेदनशील बना देती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पड़ोसी देशों का इस्तेमाल वास्तव में ऐसे सैन्य उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है, तो यह पूरे क्षेत्र में अस्थिरता को और बढ़ा सकता है।
कुछ विश्लेषक इसे “छिपे हुए युद्ध” (proxy operations) का हिस्सा भी मान रहे हैं, जहां सीधे युद्ध की बजाय सीमित और गुप्त सैन्य रणनीतियों का इस्तेमाल किया जाता है।
आगे क्या?
फिलहाल इस मामले में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई ठोस प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन आने वाले दिनों में यह मुद्दा कूटनीतिक चर्चाओं का हिस्सा बन सकता है। खासकर तब, जब ईरान और इज़राइल के बीच तनाव पहले से ही उच्च स्तर पर बना हुआ है।
