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अमेरिका-ईरान वार्ता में लेबनान संकट बना सबसे बड़ा मुद्दा, तेहरान ने कह यही तय कर सकता है बातचीत का भविष्य
स्विट्जरलैंड में शुरू हुई अहम वार्ता के केंद्र में इज़राइल-हिज़्बुल्लाह संघर्ष, प्रतिबंधों और तेल निर्यात पर भी होगी चर्चा
मध्य पूर्व की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के बीच अमेरिका और ईरान के बीच शुरू हुई नई वार्ता ने वैश्विक ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। स्विट्जरलैंड में आयोजित इस महत्वपूर्ण बातचीत से पहले ईरान ने साफ संकेत दिया है कि लेबनान में जारी संघर्ष चर्चा का सबसे अहम विषय होगा। तेहरान का मानना है कि इस मुद्दे पर होने वाली प्रगति आगे की बातचीत की दिशा तय कर सकती है।
ईरान के अधिकारियों के अनुसार, लेबनान में इज़राइल और हिज़्बुल्लाह के बीच बढ़ते तनाव ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा को प्रभावित किया है। ऐसे में यह केवल एक स्थानीय संघर्ष नहीं रह गया, बल्कि इसका असर पूरे मध्य पूर्व की स्थिरता पर पड़ सकता है। यही वजह है कि ईरान इस मुद्दे को वार्ता की प्राथमिकता बनाना चाहता है।
हालांकि, बातचीत केवल लेबनान तक सीमित नहीं रहेगी। दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे आर्थिक प्रतिबंध, ईरान की विदेशों में जमी हुई संपत्तियां और तेल निर्यात से जुड़े मुद्दे भी एजेंडे में शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन विषयों पर कोई ठोस प्रगति होती है तो क्षेत्रीय और वैश्विक अर्थव्यवस्था दोनों पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
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अमेरिका और ईरान के संबंध वर्षों से तनावपूर्ण रहे हैं। परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंध और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर दोनों देशों के बीच कई बार टकराव की स्थिति बन चुकी है। लेकिन हाल के महीनों में संवाद की कोशिशों ने उम्मीद जगाई है कि कुछ विवादित मुद्दों पर सहमति का रास्ता निकाला जा सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि लेबनान का मुद्दा इस वार्ता की सफलता या विफलता में अहम भूमिका निभा सकता है। यदि इस विषय पर कोई साझा समझ विकसित होती है, तो अन्य विवादित मुद्दों पर भी प्रगति की संभावना बढ़ सकती है।
उदाहरण के तौर पर, यदि किसी बड़े व्यापारिक समझौते में सबसे कठिन शर्त पर सहमति बन जाए, तो बाकी मुद्दों को सुलझाना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है। अमेरिका-ईरान वार्ता में लेबनान संकट को भी कुछ विशेषज्ञ इसी नजरिए से देख रहे हैं।
दुनिया भर की निगाहें अब स्विट्जरलैंड में चल रही इन वार्ताओं पर टिकी हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या दोनों देश अपने मतभेदों को कम करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं या फिर क्षेत्रीय तनाव एक बार फिर कूटनीतिक प्रयासों पर भारी पड़ता है।
