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‘Manmohan Singh को ईमानदारी का SC सर्टिफिकेट नहीं चाहिए था…’: Shashi Tharoor का बड़ा बयान, Supreme Court के फैसले के बाद बदली बहस
Supreme Court ने 2015 के समन आदेश को रद्द करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री Manmohan Singh को कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में मरणोपरांत राहत दी। इसके बाद Shashi Tharoor ने कहा कि जिन लोगों ने उन्हें इस मामले में घसीटा, उन्हें शर्मिंदा होना चाहिए।
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री Manmohan Singh को कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में Supreme Court of India से मरणोपरांत बड़ी कानूनी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने वर्ष 2015 के उस समन आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत उन्हें और अन्य आरोपियों को विशेष अदालत में पेश होने के लिए बुलाया गया था।
इस फैसले के बाद Shashi Tharoor ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पूर्व प्रधानमंत्री के समर्थन में भावुक प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि Manmohan Singh भारतीय राजनीति के सबसे ईमानदार नेताओं में से एक थे और उन्हें अपनी सत्यनिष्ठा साबित करने के लिए Supreme Court के किसी प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं थी।
“सबसे ईमानदार व्यक्ति को प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं थी”
अपने पोस्ट में Shashi Tharoor ने लिखा कि विडंबना यह है कि भारतीय राजनीति के सबसे साफ-सुथरे व्यक्ति को अपनी ईमानदारी का प्रमाण नहीं चाहिए था। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने Manmohan Singh को इस मामले में फंसाने की कोशिश की, उन्हें अपने आचरण पर शर्म आनी चाहिए।
उनका यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा का विषय बन गया और राजनीतिक गलियारों में भी इस पर प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं।
Supreme Court ने क्यों रद्द किया समन आदेश?
Supreme Court की पीठ, जिसमें Chief Justice Surya Kant, Justice Joymalya Bagchi और Justice V Mohana शामिल थे, ने कहा कि याचिका को केवल पूर्व प्रधानमंत्री के निधन के कारण समाप्त करना उचित नहीं होगा। अदालत ने मामले में Central Bureau of Investigation (CBI) की दोनों क्लोजर रिपोर्ट का अध्ययन किया।
अदालत ने पाया कि जांच एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा था कि Manmohan Singh के खिलाफ अभियोजन चलाने योग्य कोई ठोस सामग्री उपलब्ध नहीं थी। इसी आधार पर अदालत ने 2015 का समन आदेश रद्द कर दिया।
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क्या था पूरा मामला?
यह मामला वर्ष 2005 में Odisha के Talabira-II कोयला ब्लॉक के आवंटन से जुड़ा था। उस समय Manmohan Singh के पास प्रधानमंत्री पद के साथ-साथ कोयला मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार भी था।
कोयला ब्लॉक Hindalco Industries को आवंटित किया गया था। जांच के दौरान CBI ने दो बार क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर कहा कि किसी भी प्रकार के आपराधिक कृत्य के पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले।
इसके बावजूद मार्च 2015 में विशेष न्यायाधीश Bharat Parashar ने क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार नहीं की और Manmohan Singh, उद्योगपति Kumar Mangalam Birla, पूर्व कोयला सचिव P. C. Parakh, Hindalco Industries तथा कंपनी के कुछ अधिकारियों को समन जारी कर दिया।
Supreme Court पहुंचे थे Manmohan Singh

समन आदेश के खिलाफ Manmohan Singh ने Supreme Court का दरवाजा खटखटाया था। उनका तर्क था कि जब CBI स्वयं कह चुकी है कि उनके खिलाफ कोई आपराधिक साक्ष्य नहीं है, तब समन जारी करना न्यायसंगत नहीं है।
अब शीर्ष अदालत ने विस्तृत सुनवाई के बाद समन आदेश को निरस्त करते हुए इस लंबे कानूनी विवाद पर विराम लगा दिया है। Manmohan Singh का दिसंबर 2024 में निधन हो चुका था, इसलिए यह फैसला उनके निधन के बाद आया और इसे उनकी मरणोपरांत कानूनी प्रतिष्ठा की बहाली के रूप में देखा जा रहा है।
यह मामला UPA सरकार के दौरान सबसे चर्चित राजनीतिक और कानूनी विवादों में शामिल रहा था। ताजा फैसले के बाद एक बार फिर उस दौर की राजनीति और जांच प्रक्रिया पर बहस तेज होने की संभावना है।
