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ईरान पर Trump की रणनीति कितनी सफल? परमाणु कार्यक्रम से मिसाइल ताकत तक, जानिए क्या बदला

अमेरिका का दावा—ईरान की सैन्य क्षमता को बड़ा झटका, लेकिन क्षेत्रीय राजनीति में अभी भी कई सवाल बाकी।

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ईरान से जुड़े सुरक्षा और परमाणु मुद्दों पर अमेरिकी रणनीति को लेकर वैश्विक स्तर पर चर्चा तेज है।

अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव एक बार फिर वैश्विक चर्चा का विषय बना हुआ है। हालिया घटनाक्रमों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि ईरान को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा तय किए गए प्रमुख लक्ष्य आखिर कितने सफल रहे हैं।

ट्रंप प्रशासन की नीति मुख्य रूप से तीन बड़े मुद्दों पर केंद्रित रही—ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करना, उसकी मिसाइल क्षमता पर नियंत्रण और क्षेत्र में उसके प्रभाव को कम करना। हाल के अमेरिकी दावों के अनुसार, सैन्य कार्रवाइयों और दबाव की रणनीति के कारण ईरान की पारंपरिक सैन्य क्षमता को नुकसान पहुंचा है।

अमेरिकी सैन्य अधिकारियों का कहना है कि ईरान की वह क्षमता कमजोर हुई है, जिसके जरिए वह क्षेत्र में अपनी ताकत दिखा सकता था या अमेरिकी हितों और अभियानों के लिए सीधी चुनौती पैदा कर सकता था। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग स्तरों पर अभी भी चर्चा का विषय बनी हुई है।

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परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी अमेरिका लंबे समय से सख्त रुख अपनाता रहा है। वॉशिंगटन का मानना रहा है कि ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ने से रोकना क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा के लिए जरूरी है। दूसरी ओर, तेहरान लगातार यह कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है।

मिसाइल कार्यक्रम भी दोनों देशों के बीच सबसे विवादित मुद्दों में से एक रहा है। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का आरोप है कि ईरान की बढ़ती मिसाइल क्षमता क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ा सकती है, जबकि ईरान इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा का अहम हिस्सा बताता है।

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विश्लेषकों के अनुसार, सैन्य दबाव से कुछ रणनीतिक लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं, लेकिन स्थायी समाधान अक्सर कूटनीतिक बातचीत और समझौतों के जरिए ही निकलता है। यही वजह है कि हाल के महीनों में दोनों देशों के बीच बातचीत और समझौते की संभावनाओं पर भी जोर दिया गया है।

फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि ट्रंप की ईरान नीति पूरी तरह सफल रही या नहीं। लेकिन इतना जरूर है कि इस नीति ने पश्चिम एशिया की राजनीति, सुरक्षा समीकरणों और वैश्विक कूटनीति को गहराई से प्रभावित किया है। आने वाले समय में बातचीत और समझौतों की दिशा ही तय करेगी कि क्षेत्र में स्थायी शांति की संभावना कितनी मजबूत होती है।