LPG
मुंबई में LPG संकट से शुरू हुआ साइलेंट पलायन, मजदूरों की वापसी ने बढ़ाई चिंता
रेलवे स्टेशनों पर दिख रहा बदलाव, गैस सिलेंडर की कमी से परेशान होकर घर लौट रहे प्रवासी मजदूर
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई एक बार फिर एक नए संकट से जूझती नजर आ रही है। इस बार मामला न तो लॉकडाउन जैसा है और न ही किसी बड़ी आपदा का, लेकिन असर उतना ही गहरा दिख रहा है। LPG यानी रसोई गैस की कमी ने शहर के प्रवासी मजदूरों को चुपचाप वापस अपने गांवों की ओर लौटने पर मजबूर कर दिया है।
यह पलायन खुलकर सड़कों पर दिखाई नहीं देता। न तो कहीं भीड़-भाड़ है और न ही अफरा-तफरी। लेकिन अगर आप रेलवे स्टेशनों पर जाएं, तो वहां एक अलग ही कहानी सामने आती है। स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर खड़े मजदूरों की आंखों में चिंता और थकान साफ झलकती है।
गैस सिलेंडर की कमी बनी सबसे बड़ी वजह
हाल ही में किए गए एक जमीनी सर्वे में पाया गया कि बड़ी संख्या में मजदूर सिर्फ इसलिए शहर छोड़ रहे हैं क्योंकि उन्हें गैस सिलेंडर नहीं मिल पा रहा। खाने-पीने की बुनियादी जरूरत पूरी न हो पाने की वजह से उनका शहर में रहना मुश्किल हो गया है।
24 साल के एक युवक, जो पिछले पांच सालों से मुंबई की एक फैक्ट्री में काम कर रहे थे, हाल ही में छुट्टी से लौटे थे। लेकिन कुछ ही दिनों में उन्हें वापस गांव जाने का फैसला करना पड़ा। कारण साफ था — गैस सिलेंडर नहीं मिल रहा था और रोज बाहर खाना उनकी जेब पर भारी पड़ रहा था।
रेलवे स्टेशनों पर दिख रहा असली सच
शहर की सड़कों पर भले ही सब सामान्य दिखे, लेकिन रेलवे स्टेशनों पर भीड़ कुछ और ही कहानी कह रही है। खासतौर पर छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस और लोकमान्य तिलक टर्मिनस जैसे स्टेशनों पर लगातार मजदूर अपने गृह राज्यों की ओर जाते दिख रहे हैं।
पिछले कुछ दिनों में जिन ट्रेनों में सबसे ज्यादा भीड़ देखी गई, उनमें कामायनी एक्सप्रेस, राजगीर एक्सप्रेस और हावड़ा मेल शामिल हैं। ये ट्रेनें मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जाने वाले यात्रियों से भरी हुई हैं।
क्यों बढ़ रहा है ‘साइलेंट माइग्रेशन’?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह पलायन धीरे-धीरे बढ़ सकता है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि यह समस्या सीधे जीवन की बुनियादी जरूरत से जुड़ी हुई है।
अगर मजदूरों को खाना बनाने के लिए गैस नहीं मिलेगी, तो उनके पास दो ही विकल्प बचते हैं — या तो महंगे होटल का खाना खाएं या फिर अपने गांव लौट जाएं। ज्यादातर लोग दूसरा विकल्प चुन रहे हैं।

उद्योगों पर भी पड़ सकता है असर
इस स्थिति का असर सिर्फ मजदूरों तक सीमित नहीं रहेगा। अगर यही स्थिति जारी रही, तो इसका असर उद्योगों और निर्माण कार्यों पर भी पड़ सकता है। मजदूरों की कमी से काम रुक सकता है और उत्पादन पर भी असर पड़ेगा।
मुंबई जैसे शहर की अर्थव्यवस्था काफी हद तक प्रवासी मजदूरों पर निर्भर करती है। ऐसे में उनका इस तरह वापस लौटना एक गंभीर संकेत है।
पहले भी देखी जा चुकी है ऐसी स्थिति
कोविड-19 के दौरान भी इसी तरह का पलायन देखा गया था, जब अचानक लॉकडाउन लगने के बाद मजदूरों ने शहर छोड़ना शुरू कर दिया था। हालांकि इस बार हालात अलग हैं, लेकिन नतीजे कहीं न कहीं उसी दिशा में जाते दिख रहे हैं।
सरकार और प्रशासन की चुनौती
अब सबसे बड़ी चुनौती सरकार और प्रशासन के सामने है। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि गैस की सप्लाई जल्द से जल्द सामान्य हो, ताकि मजदूरों को राहत मिल सके और वे शहर में बने रहें।
अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो यह ‘साइलेंट माइग्रेशन’ जल्द ही एक बड़े संकट का रूप ले सकता है।
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